ना जाने

सोचता हुं कि निकलु मन की कैद से
अरसा हो गया है इस कैद में

कितने सूरज चड़ के उतर गए
पर मेरी आज़ादी कि कोई किरण मेरे दरवाज़े तक ना पहुंची

आसान नहीं है, इन दीवारों को तोड़ पाना
समय और मेहनत दोनों की ही जरूरत है

ना जाने कब मैं की मैं को छोड़ पाऊंगा
ना जाने कब इन दीवारों को तोड़ पाऊंगा।

जाना होगा

ना चाहते हुए भी जाना होगा
हर सांस यही बताती है

बर्फ़ की तरह स्तब्ध हो जाता हुं
जब यह बात मन तक पहुंच जाती है

मन व्याकुल हो उठता है
आंखें सो सो आंसु बहाती है

सब सामने बैठे है मेरे
फिर भी सबकी याद बहुत रूलाती है।