मैं जानता हूं

मझधार में फंसा हूं मैं, मैं जानता हूं
अपनी गलतियों की वजह से यहां हूं मैं, मैं जानता हूं

जमाने भर से लड़ा हूं मैं, मैं जानता हूं
कोरे अहम से भरा हूं मैं, मैं जानता हूं

औरों के गम में मुस्कुराया हूं मैं, मैं जानता हूं
ज़ुल्म करने में ना हिचकिचाया हूं में, मैं जानता हूं

ईर्षा में पागल होकर छटपटाया हूं मैं, मैं जानता हूं
खुशी किसी कि भी ना देख पाया हूं मैं, मैं जानता हूं

काश के कोई समझा देता मुझे
जो असल बात है वोह बता देता मुझे

तो आज इतना पछतावा ना होता
रुंधे रुंधे गले से मैं इतना ना रोता

अब कोई मेरी कब्र पर फूल चढ़ाने नहीं आता
मेरे जिंदा ना होने का मातम नहीं मनाता

अब तो दोजक की आग जलाए मुझे
कब से जागा हूं, सुलाए मुझे

सब झूठ था, अब मानता हूं मैं
अब असल मैं कुछ जानता हूं मैं।

क्यों लगे की थोड़ा है

कहने को जब सब पास है मेरे
फिर क्यों लगे की थोड़ा है

कहां कीमत होगी इन सिक्कों की
जिन्हे खून जला-जला कर जोड़ा है

क्यों आज यह सिक्के
मेरे मददगार नहीं

क्यों इन्हे मेरे होने ना होने से
कोई साहुकार नहीं

फिर क्यूं यह ज़माना हमें यही सिखाता है

की सिक्कों कि खनक में ही खुशी है
और हर अमीर आदमी खूब सुख पाता है

आज मेरे पास बहुत सिक्के है
पर कतरा भर भी खुशी नहीं

कहने को बहुत अमीर हूं मैं
पर ज़रा सा भी सुखी नहीं

क्यों आज कोई मददगार नहीं
सब अनजाने हो गए

क्यों आज रिश्तों की भी कोई कीमत नहीं
सब बेमायने हो गए

ग़र यही सलूख करना था काफ़िरो
तो क्यूं इस रास्ते पर चलाया था

शायद इसी लिए तुम मुझे देख कर हंसते थे
जब मैंने मिट्टी के बदले अनमोल पलो को लुटाया था

शुक्र है उस बीमारी का
जिसने यह वेग मोड़ा है

अब असल कमाई करूंगा मैं
सब मिट्टी था जो जोड़ा है