क्यों लगे की थोड़ा है

कहने को जब सब पास है मेरे
फिर क्यों लगे की थोड़ा है

कहां कीमत होगी इन सिक्कों की
जिन्हे खून जला-जला कर जोड़ा है

क्यों आज यह सिक्के
मेरे मददगार नहीं

क्यों इन्हे मेरे होने ना होने से
कोई साहुकार नहीं

फिर क्यूं यह ज़माना हमें यही सिखाता है

की सिक्कों कि खनक में ही खुशी है
और हर अमीर आदमी खूब सुख पाता है

आज मेरे पास बहुत सिक्के है
पर कतरा भर भी खुशी नहीं

कहने को बहुत अमीर हूं मैं
पर ज़रा सा भी सुखी नहीं

क्यों आज कोई मददगार नहीं
सब अनजाने हो गए

क्यों आज रिश्तों की भी कोई कीमत नहीं
सब बेमायने हो गए

ग़र यही सलूख करना था काफ़िरो
तो क्यूं इस रास्ते पर चलाया था

शायद इसी लिए तुम मुझे देख कर हंसते थे
जब मैंने मिट्टी के बदले अनमोल पलो को लुटाया था

शुक्र है उस बीमारी का
जिसने यह वेग मोड़ा है

अब असल कमाई करूंगा मैं
सब मिट्टी था जो जोड़ा है

मिलते रहो

तुम से बात कर के दिल को एक तसल्ली सी हो जाती है,
की इस पूरी दुनिया में, मेरा भी कोई दोस्त है।

कोई है जिससे जब चाहो तब बात कर लो,
वरना दुनिया में कोई किसी को कहां सुनता है।

आजकल तुमने भी मेरा फोन उठाना बंद कर रखा है,
ख़ुदा करे की किसी परेशानी में ना हो तुम।

तुम ना आयो वोह तो चल जायेगा,
पर तुम्हे कुछ हो जाए, यह हमें ग्वारा नहीं।

ना जाने कौन सा काम करने लगे हो तुम,
जिसमें सांस तक लेने की फुरसत नहीं।

पैसा जरूरी है जिंदगी के चिरागों को रोशन रखने के लिए, पर उसी में लगे रहो, तुम्हे इतनी भी गुरबत नहीं।

मेरा तो चंद सालो का ही खेल बाकी है,
उसके बाद तो रूकसत हो जाना है।

कुछ यादें बटोरना चाहता हूं अपने सफर के लिए,
मुझे मरने के बाद भी मुस्कुराना है।

इसी लिए दरख़्वास्त है मेरी की मेरे दोस्त,
तुम मुझे बार बार आकर मिलते रहो।

मुझे किसी दिन तुम फोन करो,
की तुम मेरे घर के बाहर हो, ऐसा कहो।

मुझे बार बार आकर मिलते रहो।।