मन की दशा

चुभते है कांटे पर दवा नहीं है
गहरे है ज़ख्म पर कोई गवाह नहीं है

खोलता है दिल मुझे अपनो की फिक़र है
कांटो से छलनी छलनी हुआ यह ज़िगर है

आहो मैं कटते है मेरे दिन और रात
चोट खाए इस दिल में है गहरे जज़बात

शब्दों के दीलासो में अब असर नहीं है
क्या कर जाए कोई ख़बर नहीं है।

08.08.2013

जाना होगा

ना चाहते हुए भी जाना होगा
हर सांस यही बताती है

बर्फ़ की तरह स्तब्ध हो जाता हुं
जब यह बात मन तक पहुंच जाती है

मन व्याकुल हो उठता है
आंखें सो सो आंसु बहाती है

सब सामने बैठे है मेरे
फिर भी सबकी याद बहुत रूलाती है।