कुछ यादें

कुछ यादें, कुछ लम्हें
कुछ बातें अनकही

कुछ अपना छोड़ के
कुछ रस्ते मोड़ के

मैं अपने घर से निकाल तोह पड़ा
सोच कर कि सामने सुनहेरा भविष्य है खड़ा

यहां आकर देखी काली रात
पर याद आई घरवालों की समझाई बात

की कुछ भी हो ना घबराना
जो करने गए हो, उसे पूरा कर के ही आना।

मसला

कुछ डरा सा हूं, कुछ होंसला भी है
क्या महसूस करू, मसला यही है

कुछ दूर से मुझे कुछ, दिख तो रहा है
क्या वोह सच में है सूरज, या कोई टॉर्च जली है
कैसे बताऊं, मसला यही है

मैं डरता नहीं हूं, खुद को बहुत बार बोला
आखिर डर छुपता कहां है, कोना कोना खंगोला
है भी और मिलता नहीं है, मसला यही है

समय उसी और भागा है जाए
कैसे रोकू इसे, क्या करू उपाय
रेस तोह है मगर ब्रेक नहीं है, मसला यही है