अपने आप में आयो तुम


चलो दुख मनाना बंद करो, और अपने आप में आयो तुम
यह ज़िन्दगी है दुख मई, समझो संभल जाओ रे तुम

यह ज़िन्दगी कुछ भी नहीं, कुछ लम्हों की खेरात है
अपना पराया क्या यहां, कुछ भी ना जाना साथ है

हर सांस में इक आस है, कितना तुम्हे भटकाएगी
मन की दबी सी आवाज़ है, वोह क्या तुम्हे समझाएगी

सबल करो इस मन को तुम, तृष्णा को पहले त्याग दो
भीतर के उठते वेग को, प्रज्ञा से तुम निकाल दो

बहादो वोह सब कल्पना, जीवन में जिससे भार है
समता में खुद को स्थिर करो, समता ही जीवन सार है।

30/05/2014

बाकी कुछ नहीं

समय तो ख़ुद-बा-ख़ुद ही निकल जाता है
जब तक जिए फिज़ाओं में

चंद घड़ियां भी बहुत लंबी लगती है
ग़म की छाओ में

दोनों ही वक़्त, झूठे और बेमतलबी है
पर जीवन भर समझ ना सके

कोल्हू के बैल की नाइ
बस चलते ही गए, चलते ही गए

ज़मीर बेचा और प्यार बिक गया
अच्छा वक़्त लाने के लिए

कमबख़्त वक़्त तोह आया नहीं
पर मौत आ गई सुलाने के लिए

अब अपना ही घर नहीं मिल रहा है मुझे
अपने ही गांव में

तन मेरे बहुत जल रहा है
पुराने बरगद की छाओं में

अब अक्ल आए भी तो क्या
तांश के पत्तो का खेल तो पूरा हो गया

अब माफ़ी मांगे भी तो क्या
ज़माने भर के लिए में बुरा हो गया

अब सोच रहा हूं कि कुदरत एक मौका और दे अगर
तो गलतियां सुधार लू

इस बार औरों के लिए जियू
और ज़माने भर को प्यार दू

पर यहां दूसरा मौका देते नहीं
कहते की बेऐतबारी है

अल्लाह को रो कर क्या कहूं
जब गलती ही हमारी है

गर वक़्त है तो जान लो विशाल
सब मिट्टी है और मेला है

पूरे यकीन से इबादत करो उस रब की
गर मजनू है तो लेला है

वोह है, वोह है, वोह है, वोह है
बाकी कुछ नहीं

यह उसकी महफ़िल का नशा है
शराब और साकी कुछ नहीं

इबादत ही सच है, बाकी कुछ नहीं
कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं।