सिक्कों की शांति

सारे विश्व की आवाम, एक ही बात जानती है
की नोटों की गड्डियों में ही शांति है

जितने हो उतने कम है
इनसे ही मिटते सब गम है

सब सुखों का कारण है यह
आनंद का उदहारण है यह

मुझे भी यही सिखाया था
बचपन से यही पढ़ाया था

इसीलिए

कमाने के लिए, हाथों में पकड़े कटोरे थे
बड़ी मेहनत से, चंद सिक्के मैंने बटोरे थे

पर सिक्कों ने जो वादा किया था, वोह सुख दिया नहीं
और मन ने सोचा, कि शायद अभी माकूल सिक्कों को इकठ्ठा किया नहीं

मन की तृष्णा क्यों यह मानती नहीं
की दुनिया भर के सिक्कों में भी शांति नहीं

गलती हमारी नहीं दरअसल, सिखाने वालों ने हमें गलत ही सिखाया
सिक्के ही सुख का कारण है, यही बतलाया

मैं तो जान गया हूं अब, पर ना जाने यह आवाम कब यह समझ पाएगी
की जीवन की सच्चाई, इन सिक्कों की पकड़ में कभी नहीं आएगी।

04.10.2012

कुछ आंसू बहा कर

कुछ आंसू बहा कर, तुम सचे बन गए
अब रो लिए है हम, यह कह कर तन गए

पर तुम्हे अपनी गलती का तो एहसास नहीं
कहां बेच आए हो, जो इतनी सी शर्म भी तुम्हारे पास नहीं

और फिर कहते हो की सब नोर्मल करदो
अब कभी ना सुनाना इस भूल का किस्सा, इसे दफ़न करदो

पर तुम्हे ना कोई एहसास है, और ना ही कोई बदलाव है
कल भी यही करोगे, बस कब? यही सवाल है

तुम कितने स्वार्थ से भर गए हो, की तुम्हे अपनो का दुख दिखता नहीं
यह तो खून के रिश्तों की पकड़ है, वरना इस तूफ़ान में कोई टिकता नहीं

ना करो मिट्टी वोह साल, वोह दिन जो सिंचन में लगाएं है
मत छोड़ो इस कश्ती को, किनारे से बहुत दूर हम आएं है

कहना हमारा फ़र्ज़ है, पर करना तुम्हारी चाह है
फूल बिछा रहे थे हम क़दमों में, क्यूंकि कांटो भरी यह राह है

समझ करो ऐ प्यारे, अपनी भूल सुधारो
अपने नहीं मिलेंगे कहीं, चाहे लोग इकठ्ठे करलो हज़ारों।