इच्छा

मेरी भी एक इच्छा थी
की माता, पिता के नाम को चमकाऊँगा
जो किसी ने नहीं किया, वोह मैं कर दिखाऊंगा

पर इच्छा पूरी हुई ना मेरी
पंद्रह वर्ष यु बीत गए
तुम जीत गए, तुम जीत गए
यह कहने वाले मीत गए

अब लगता है मैं हार गया
नदिया के उस पर गया
जहाँ दर्द नहीं, जहाँ प्यार नहीं
जहाँ कोई एहसास नहीं

पर में अपनी इच्छा को नहीं दबाऊंगा
तुम देखना, तुम देखना
जीवन की कक्षा में मैं ही प्रथम आयुंगा|

होंगी कृष्ण संग गोपिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधे ब्रज मा बैठी बिलके
गए नहीं कृष्ण इस बार भी मिलके
काटे थे दिन मैंने गिन गिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

पूछूंगी कहां अब तक दिन बिताए
मिलने तुम इतने दिन से ना आएं
हुआ तुमसे मिलने कठिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जाने कहां वोह रास रचाए
गोपियों का मन कृष्ण पे आए
कृष्ण तो है भी चंचल मन, कमसिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जब कोई गोपी कृष्ण को छूती
दिल करता उसे कर दुं विभुति
कृष्ण बस मेरे ही स्वामीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

काश मैं होती कृष्ण के संग
देख लेती सवारें के रंग
राधा तड़पे जैसे पानी बिन मीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

यह सब सोच रही थी राधा रानी
पीछे सुनी कान्हा को वाणी
मुड़ देखा, खड़े रसलीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधा की सुध बुध सी खो गई
कृष्ण को देख बस मस्त सी हो गई
कृष्ण कहें की राधा तेरे ही आधीन

संग नहीं थी कोई गोपीन।