उलझे रिश्ते

जो थे दोस्त हमारे, आज दुश्मन कहलाए है
बेवजह हमने रिश्ते उलझाए है

अनख के नाम पर दोनों भिड़ गए बाज़ार में
छोटी छोटी बातों पर बवाल उठाए है

बेवजह हमने रिश्ते उलझाए है

ना मुआफ़ हम कर पा रहे है उन्हें
ना माफ़ी वोह मांग पाए है

बेवजह हमने रिश्ते उलझाए है

पर इक दिन भी ऐसा नहीं, जब उनकी याद ना आई
बहुत रातों से ना तो हम, ना ही वोह सो पाए है

बेवजह हमने रिश्ते उलझाए है

दिल बहुत करता है की उनके दर पर दस्तक दे
पर माफ़ी के लिए कहां शब्द जुटा पाए है

बेवजह हमने रिश्ते उलझाए है

उम्र के इस पड़ाव पर यह कैसा बचपना है विशाल
फ़कीर जैसे अपनी झोली के सिक्के लुटाए है

बेवजह हमने रिश्ते उलझाए है

दोस्ती सही मानो मै आपसे ही सीखी है
मुआफ़ कर दीजिए हमें, अपनी गलती पर बहुत पछताए है

बेवजह हमने रिश्ते उलझाए है।

रास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

अजनबी शहर को टटोलता रहा, बुलाया पर कोई पास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

बहुत उम्मीद लगाई थी इस सफ़र से, चलता रहा पर परवाज़ ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

याद भरी आंखें आंसुं बहाए, सिसकियां ली पर सांस ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

लोगों का जीवन खुदगर्ज़ी से भरा है, बहुत कोशिश की पर यह अंदाज़ ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

दो पल खुल के जीना चाहता था, आज़ादी मिली पर उलास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

पर हारना मेरी और ज़िन्दगी की पहचान नहीं, कोन नहीं जिसके जीवन में बनवास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

ज़ख्म खाए है पर होंसला बुलंद है, विशाल ऐसा बना की लोगों को विश्वास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया