बाकी कुछ नहीं

समय तो ख़ुद-बा-ख़ुद ही निकल जाता है
जब तक जिए फिज़ाओं में

चंद घड़ियां भी बहुत लंबी लगती है
ग़म की छाओ में

दोनों ही वक़्त, झूठे और बेमतलबी है
पर जीवन भर समझ ना सके

कोल्हू के बैल की नाइ
बस चलते ही गए, चलते ही गए

ज़मीर बेचा और प्यार बिक गया
अच्छा वक़्त लाने के लिए

कमबख़्त वक़्त तोह आया नहीं
पर मौत आ गई सुलाने के लिए

अब अपना ही घर नहीं मिल रहा है मुझे
अपने ही गांव में

तन मेरे बहुत जल रहा है
पुराने बरगद की छाओं में

अब अक्ल आए भी तो क्या
तांश के पत्तो का खेल तो पूरा हो गया

अब माफ़ी मांगे भी तो क्या
ज़माने भर के लिए में बुरा हो गया

अब सोच रहा हूं कि कुदरत एक मौका और दे अगर
तो गलतियां सुधार लू

इस बार औरों के लिए जियू
और ज़माने भर को प्यार दू

पर यहां दूसरा मौका देते नहीं
कहते की बेऐतबारी है

अल्लाह को रो कर क्या कहूं
जब गलती ही हमारी है

गर वक़्त है तो जान लो विशाल
सब मिट्टी है और मेला है

पूरे यकीन से इबादत करो उस रब की
गर मजनू है तो लेला है

वोह है, वोह है, वोह है, वोह है
बाकी कुछ नहीं

यह उसकी महफ़िल का नशा है
शराब और साकी कुछ नहीं

इबादत ही सच है, बाकी कुछ नहीं
कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं।

कितना सहे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

क्या कटु बोलना प्रेमी का अधिकार है
फिर क्यूं उसके शब्द मुझे लगे तिरस्कार है
मोहब्बत की इस कड़ी को हम क्यों ना समझ सके

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

क्या कटु सुनने में छुपा हमारा भला है
फिर क्यों उन शब्दों से कलेजा मेरा जला है
जलने का डर मुझे कर रहा तुम से परे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

फूलों के संग भी लगे हज़ारों कांटे है
क्या यही सोचकर तुमने अपने शब्द छांटे है
मेरे मन उन नोकीले कांटो से बहुत है डरे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

कैसे समझाए मन को की कटु बोलना तुम्हारी आदत है
उन शब्दों में भी छुपी मेरे लिए तुम्हारी इबादत है
मन की इस उलझन को कैसे दूर करें

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

30.03.2009