क्या है ज़िन्दगी – 3

दुख में पनपती, छटपटाती ज़िन्दगी
तरसती और मुरझाती ज़िन्दगी

उम्मीदों के तानों को बुनती ज़िन्दगी
घड़ी की टीक टीक को सुनती ज़िन्दगी

पेट की तपिश में बार बार झुलसती ज़िन्दगी
दो टुकड़ों के लिए बिक जाती, हो जाती इतनी सस्ती ज़िन्दगी

छोटी डगर को लम्बा समझती ज़िन्दगी
डगर के लम्बे सफ़र से सहमती ज़िन्दगी

सफ़र में राहगीरों की तलाश करती ज़िन्दगी
फिर एक एक करके सबको दरकिनार करती ज़िन्दगी

बेमतलबी, बेवजह, बदगुमान ज़िन्दगी
तड़पती, बिलखती, मौत पे सवार ज़िन्दगी

मत पूछो वजह क्या है मेरे यार ज़िन्दगी
बताने से इसने किया है इंकार ज़िन्दगी।

उड़ने की तमन्ना

उड़ने की तमन्ना और संभल कर चलना
यह एक ही सिक्के के दो हिस्से है

नहीं तो जनाब, खोलो किताब
उन जैसे लोगों के भरे पड़े किस्से है

की वोह लोग ऐसे गिरे
की गिरने की आवाज़ तक ना हुई

राख हुई उनकी उम्मीदें
और सपने जल गए जैसे हो रूई

दोनों ही पंख ग़र सबल हों
तब ही उड़ान भर सकते हो

हवा को शर्मिंदा
और क्षितिज का दीदार कर सकते हो

ग़र समझ गए तो खोलो दोनों पंख
और उड़ान भरो

छा जाओ पूरी कायनात पर
और अपनी मुठ्ठी में आसमान करो।

13.02.2013