अंगीठी मन बना

मिट्टी बंटी, देश बना
तन बंटे, भेष बना

मन बंटे, कलह कलेश बना
धर्म के ठेकेदारों ने इस सब को जना

गोली का निशाना, हर एक जन बना
जहां फूलों की थी फुलवारी, वोह जगह अब रण बना

खून में लिपटा और लाल हर कण बना
नफ़रत सुलगी और अंगीठी मन बना।

मसला

कुछ डरा सा हूं, कुछ होंसला भी है
क्या महसूस करू, मसला यही है

कुछ दूर से मुझे कुछ, दिख तो रहा है
क्या वोह सच में है सूरज, या कोई टॉर्च जली है
कैसे बताऊं, मसला यही है

मैं डरता नहीं हूं, खुद को बहुत बार बोला
आखिर डर छुपता कहां है, कोना कोना खंगोला
है भी और मिलता नहीं है, मसला यही है

समय उसी और भागा है जाए
कैसे रोकू इसे, क्या करू उपाय
रेस तोह है मगर ब्रेक नहीं है, मसला यही है