शब्द वफादार नहीं

समेटे, स्वारे, सजाए
और भेज दिए थे यह शब्द

मुझे सजदा करके चले थे
की वहां परवाज़ दिखाएंगे
अरे तुम अपने कान खुले रखना
हम हंसी की गान सुनाएंगे

पर वक़्त चल गया था अपनी चाल
कम्बख़त शब्दों ने जाने क्या बताया था
रुंधा रुंधा था मां का गला
आंसूओं में खुद को भिगाया था

ऐ शायर, तेरे शब्द वफादार नहीं
तु शायर बनने का हकदार नहीं

क्यों भूल जाता है तु की
मां का दिल नाजुक होता है
बेटे की हर इक आह
मां के दिल पे चाबुक होता है

तु कैसा शायर है
जो मां के दिल को समझ ना सका
तु युंही शब्द लिखता है
तेरी कलम का रस नहीं पका

अब माफ़ी भी मांगेगा तो कैसे
शब्द अब और तेरा खज़ाना नहीं है
कुछ ना कर, बस जा के लगा जा मां के गले
तुझे, मुझे और कुछ समझाना नहीं है।

आंखों से पिलाना

प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

आंखों से पिलाना, इस मेखाने की खासियत है
यहां नाच गाना नहीं होता, कुछ ऐसी सुफियत है
यह अल्लाह के बन्दों की मदहोश महफ़िल है

लोग डूब जाते है, वोह आंखें नीची नहीं करते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

कुछ घूंट आंखों के मैं अभी पी के आया हूं
खुद लूट गया हूं मैं, या कुछ लुट लाया हूं
मैं नशे में चूर हूं, मुझसे नहीं पूछो

सरुर ऐसा है कि अब हम फ़िक्र नहीं करते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

यहां शमाए बुझ भी जाए ग़र, परवाने फिर भी जलते है
पीना रोक भी दे ग़र, कहां दिल संभलते है
दिल को आज बेहने दो, जन्नत पे दस्तक दे

जनुन इतना है के कमबख्त, ना मरने से है डरते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

मोहब्बत तीर दे, कमान मैं खुद बना लूंगा
तुम चिंगारी है दो बस, मैं खुद सुलगा लूंगा
कत्ल होने की मेरी ना थी कोई आरज़ू

पर आशिक़ देख ले पल भर, तो ख़ुद-बा-ख़ुद ही है मरते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

जन्नत की जो थी आरज़ू, हुई महखाने में पूरी
आशिक़ और मुझ में है, प्याले लबों की दूरी
तेरे रूबरू हो कर, मैंने है जो पाया

पाने को उसे फ़रिश्ते, ज़मीन पर है उतरते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते।