जाम-ए-हकीक़त

खनकते जाम
सुर्खियों में नाम
ना खबर सुबह
ना खबर शाम
क्या यही है इनाम
क्या यही है इनाम
मेरी बेथक मेहनत का
क्या यही है अंजाम

मैं क्यों चला था
मैं किस लिए चला था
क्या कर दिखाना था ज़माने को
अरे छोड़ो यारों, मैं आम आदमी ही भला था

इस चमक ने मुझको अंधा कर के
अपनो से बहुत दुर किया
छीन के मेरे मासूम पन को
ज़ालिम और मगरूर किया

यहां दिखती है रोशनी, पर अंधेरा है
लोग कहने है सुरज मुझे
और मैं ही ढूंढू कहां सवेरा है

अब वापिस जाने की राहें ना दिखे मुझे
रिश्ते नाते लग रहे उलझे उलझे

सुर्खियों में नाम भी कहीं खो गए
खनकते जाम ना जाने कहां सो गए

अब लोगों को नाम भी मेरा याद नहीं
कहते है कि हां कोई फला था

अरे छोड़ो यारों, मैं आम आदमी ही भला था।

आंदोलन

मंदिर मेहलों से सजे है
लोग लिए खड़े ध्वजे है
फिर भी शांति क्यों नहीं

और लोग बदलने को तैयार है
सड़को पर खड़े मांग रहे अधिकार है
फिर भी क्रांति क्यों नहीं

कुछ इसी तरह के सवाल
पीछले पच्चीस वर्षों से पूछ रहा हूं
नैतिक ज़िम्मेदारी और निजी स्वार्थ
इन दोनों मै ही जूझ रहा हूं

यह वही सवाल है जो की
सदियों से पूछे जा रहे हैं
कोई भी इन से अछूता नहीं है
यह हर किसी के ज़हन में आ रहे है

पर समाज की बुनियाद पर
कैसे पड़े प्रभाव
यह बात जानने लायक है
मिलके खो़जते है हम और आप

ख़ोजा तो पाया कि इंसान का जीवन
पेट की भूख से बंधा है
बदलना और करना तो हर कोई बहुत कुछ चाहता है
पर जरूरते ज़िन्दगी में ही फसां है

थाली की रोटी में ही छूपी
इंसान की क्रांति और शांति है
इसी के लिए मंदिरों में गर्दनें झुकती है
और जनता सरकारों को मानती है

फिर तो जिस दिन थाली में से रोटी जाएगी
उसी दिन इंसान करहाएगा
उस दिन एक नया गांधी पैदा होगा
और मेरे देश में आंदोलन आएगा।