क्या है ज़िन्दगी – 2

क्या है ज़िन्दगी?
कुछ भी तो नहीं
बेचारी सांसों की मोहताज़ है

भर्ती है, रोकती है, छोड़ देती है
क्यूंकि अगले सांस की आस है

इसी कशमकश को ज़िन्दगी कहते है
किराए के इस मकान में
ऊपर के चोबरे मैं हम रहते है।

जरूर आएगा

बहुत इंतजार किया हमने, उम्मीदों भरी आंखों से
पर कुछ ना मिला हमें, उन दिलासो भरी बातों से

वक्त की मरहम भरी उंगलियां ज़ख्मो को सहलाती थी
और फिर से वही ज़िन्दगी शुरू हो जाती थी

पर मन में यह आस थी कि सब ठीक हो जाएगा
आज अगर दुख है तो सुख भी जरूर आएगा|