हरी हिलता क्यों नहीं

ॐ से बनी यह दुनिया, बोम्ब तक पहुंच गई
फिर भी हरी हिलता क्यों नहीं

लोग दर्द में करहा रहे है
बेगुनाह मर रहे है, और तमाशाही तालियां बजा रहे है
खून की नदियां, बह बह कर सुख गई
अब लाल हुई इस इस मिट्टी में, कोई फूल खिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

ताकतवर, कमज़ोर को दबा रहे है
इंसानियत बिक रही है, और हैवान बोलियां लगा रहे है
कहने को तो बहुत कुछ है इस जहान में
पर पेट भर खाना, गरीब के बच्चे को मिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

कहीं सुकून नहीं, चारो तरफ ही शोर है
कोई यहां पाक नहीं, हर दिल में छुपा चोर है
विचारों की ऐसी गुरबत क्यों है यहाँ
की अब गीता ज्ञान से भी, गिरता यह मन संभालता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं।

शहर की आबादी

मेरे शहर की आबादी बड़ गई है
सड़को पे लोगो की आवाजाही बड़ गई है

सड़के, दुकानें, गालियां और घर
सब भीड़ से भर गए है

छोटे छोटे मकानों में कबूतरों की तरह रहने लगे है लोग
बड़े मकान में रहने के जो थे सपने, वोह जेहन से उतर गए है

पहले दो तीयाही जी कर और एक तियाही ज़िन्दगी सो कर गुजरती थी
अब एक तियाहि से ज्यादा तोह सड़क पे गुजर जाती है, जीने और सोने का तोह पूछो ही मत

सड़क को ही अब मैं अपना घर मानता हूं
उससे घर पर ना होने कि तकलीफ कम है

क्यूंकि इतने लोग होने के बावजूद भी, जितने फासले दिलो के है
उनसे तोह अभी सड़को के फासले कम है।।