मेरे शहर की आबादी बड़ गई है
सड़को पे लोगो की आवाजाही बड़ गई है
सड़के, दुकानें, गालियां और घर
सब भीड़ से भर गए है
छोटे छोटे मकानों में कबूतरों की तरह रहने लगे है लोग
बड़े मकान में रहने के जो थे सपने, वोह जेहन से उतर गए है
पहले दो तीयाही जी कर और एक तियाही ज़िन्दगी सो कर गुजरती थी
अब एक तियाहि से ज्यादा तोह सड़क पे गुजर जाती है, जीने और सोने का तोह पूछो ही मत
सड़क को ही अब मैं अपना घर मानता हूं
उससे घर पर ना होने कि तकलीफ कम है
क्यूंकि इतने लोग होने के बावजूद भी, जितने फासले दिलो के है
उनसे तोह अभी सड़को के फासले कम है।।
Category: Poems
हम है आज़ाद परिंदे
हर गम से तु
मज़बूरी से
आज़ादी दे
मज़बूरी से
आज़ादी दे
ओ मौला
मुझे आज़ाद
कर दे
मेरे पंखों को
खुलने की
जगह दे
इतनी की
सूरज को भी
हम छुपा दे
ओ मौला
मुझे आज़ाद
कर दे
कुछ पाने कि
हर ख्वाहिश ही
फ़ना कर दे
तेरे इश्क़ की
चाहत से ही
मुझे भर दे
ओ मौला
मुझे आज़ाद
कर दे
मेरे कन कन को
आज़ादी से
ऐसे भर दे
की सांस-सांस मेरी बोले
हम है
आज़ाद परिंदे
हम है
आज़ाद परिंदे

