समय

बीता समय, अच्छा था या बुरा, कुछ याद नहीं ।
क्या वोह लम्हे बरकत के थे या हरज़े के, कुछ याद नहीं ।।

याद है तो बस इतना, की जिंदगी थी और हम जिंदा थे ।
क्यों और कैसे, उतना सब तो अब याद नहीं ।।

याद करके करना भी क्या है ओ शायर, समय तो बह कर गुज़र गया ।
आज खड़ा है सामने हाथ बढ़ाए, की चलो कुछ नई यादें बनाएं ।।

अब कोशिश हो की ऐसे जिए, की लम्हा-दर-लम्हा याद रहे ।
सजाए कुछ ऐसा यादों के आशियाने को, की हमारे जाने के बाद भी वोह आबाद रहे ।।

मुक्ति


गर ना करो कोई इच्छा
तो मुक्त हो तुम
मान लो कथन यह सच्चा
तो मुक्त हो तुम

मन ही है,
जो तुम्हे भटकाए
असल को छुड़वा,
अपने पीछे लगाए
जब छोड़ो पीछा इसका,
तो मुक्त हो तुम

गर ना करो कोई इच्छा
तो मुक्त हो तुम

पर मन से परे हम,
कैसे है जाए
हर जगह इसने,
अपने सिपाही बिठाए
जो पकड़ो सांस का रस्ता,
तो मुक्त हो तुम

गर ना करो कोई इच्छा
तो मुक्त हो तुम

देखते देखते यह,
सिमटता है जाए
मिटने से पहले जब,
मन आंखें टिमटिमाए
ध्यान रहे तब पक्का,
तो मुक्त हो तुम

गर ना करो कोई इच्छा,
तो मुक्त हो तुम

गहन नींद में जब,
यह खो जाए
गर तब भी तुम,
अगर ना डगमगाए
जैसे ही मैं ने मैं को देखा,
तो मुक्त हो तुम

गर ना करो कोई इच्छा,
तो मुक्त हो तुम

असल को तुम,
जब पहचानोगे
तुम क्या हो,
तुम यह जानोगे
मिट जाएगा कर्मों का लेखा,
तो मुक्त हो तुम

गर ना करो कोई इच्छा, तो मुक्त हो तुम