वो तजुर्बा है

थोड़े शब्दो में गहरी बात कह जाना, वो तजुर्बा है

गुस्सा बहुत हो पर चुप रह जाना, वो तजुर्बा है

भूख जितनी हो उससे थोड़ा कम ही खाना, वो तजुर्बा है

अपनी रोटी का एक हिस्सा किसी भूखे को खिलाना, वो तजुर्बा है

मां बाबा के कहे बिना उनके पांव दबाना, वो तजुर्बा है

घर जाते समय बच्चों के लिए कुछ ले जाना, वो तजुर्बा है

घर के सूरत–ए–हाल दुनिया को ना दिखालाना, वो तजुर्बा है

बाहर की उलझनों को घर पर ना ले आना, वो तजुर्बा है

अपना समय अच्छे लोगों की संगत में लगाना, वो तजुर्बा है

ज़िंदगी को कोशिशों से कल से बेहतर बनाना, वो तजुर्बा है

चकाचौंध की जिंदगी से ख़ुद को बचाते चलेजाना, वो तजुर्बा है

किसी की मदद करते समय उसको ना जतलाना, वो तजुर्बा है

ख़ुद को याद दिलाते रहना की पता नहीं हमें कब चले जाना, वो तजुर्बा है

आखिरी घड़ियों में रब का शुक्रिया करना और मुस्कुराना, वो तजुर्बा है

तुम्हारी मौत के बाद

तुम्हारी मौत के बाद, ऐसा होगा मेरे यार
सब रिश्तेदार रोएंगे, चाहे ना ही दिल में प्यार

रोएंगे चिलाएंगे, करेंगे इकरार
बताएंगे ऐसा, की तुम थे जीवन का आधार

सोच में पड़ गए ना प्यारे
की क्या यही है संसार

हां यही है संसार
हां यही है संसार

तुम ख़ुद भी तो कर के देखो विचार
तुमने भी ऐसा किया होगा कई बार

तुम भी तो झूठा रोए थे
जब तुमने मित्र खोए थे

कुछ नहीं पड़ा इस दिखावे में
बन जाओ समझदार

मृत्यु तो एक दिन आएगी
चाहे करलो यत्न हज़ार

नहीं तो, इस दिखावे के लिए तुम भी ही जायो त्यार
नफ़रत करने वाले भी, तारीफ़ करेंगे मेरे यार