जिंदगी समझ में कहां आती है?
कहां पूरी होती है वोह ख्वाहिशें
जो चाहत–ए–रूह हो जाती है
जिंदगी…
रोज़मराह की मुश्किलों को आसान करने में
टुकड़ा टुकड़ा कर के सारी उम्र गुज़र जाती है
जिंदगी…
जैसे दिन ढल जाता है, कुछ देर रहकर
वैसे ही यह जिंदगानी ढल जाती है
जिंदगी…
समय की रेत में, सब मिटता चला जा रहा
कहां मेरी कोई खींची लकीर, बनी रह पाती है
जिंदगी…
और फिर कहते है
की जिंदगी का मिलना बहुत बड़ी इनायत है
मान लिया, मुझे कहां इस बात से कोई शिकायत है
पर क़त्ल-ओ-ग़ारत के इस माहौल में
कितनो को कोई मदद-गारी मिल पाती है
जिंदगी…
शायद कोई मतलब, कोई जवाब, है ही नही
कितने बने, कितने मरे, कोई हिसाब है ही नही
बस नदी की लहर है, जो की बहती चली जाती है
जिंदगी समझ में कहां आती है?
Category: Poems
तुम्हारी मौत के बाद
तुम्हारी मौत के बाद, ऐसा होगा मेरे यार
सब रिश्तेदार रोएंगे, चाहे ना ही दिल में प्यार
सब रिश्तेदार रोएंगे, चाहे ना ही दिल में प्यार
रोएंगे चिलाएंगे, करेंगे इकरार
बताएंगे ऐसा, की तुम थे जीवन का आधार
सोच में पड़ गए ना प्यारे
की क्या यही है संसार
हां यही है संसार
हां यही है संसार
तुम ख़ुद भी तो कर के देखो विचार
तुमने भी ऐसा किया होगा कई बार
तुम भी तो झूठा रोए थे
जब तुमने मित्र खोए थे
कुछ नहीं पड़ा इस दिखावे में
बन जाओ समझदार
मृत्यु तो एक दिन आएगी
चाहे करलो यत्न हज़ार
नहीं तो, इस दिखावे के लिए तुम भी ही जायो त्यार
नफ़रत करने वाले भी, तारीफ़ करेंगे मेरे यार

