बस देखो ज़रा

कांटो में भी है हरियाली
दुख में भी है खुशहाली
बस देखो ज़रा

माना दुख बना सुल है
पर पतझड़ में भी तो फूल है
बस देखो ज़रा

दुख की रात है अंधियारी
पर तारों में तो है चिंगारी
बस देखो ज़रा

रात में भी प्रकाश ही प्रकाश है
चन्दा की रोशनी से मद मस्त हुआ आकाश है
बस देखो ज़रा।

शब्द वफादार नहीं

समेटे, स्वारे, सजाए
और भेज दिए थे यह शब्द

मुझे सजदा करके चले थे
की वहां परवाज़ दिखाएंगे
अरे तुम अपने कान खुले रखना
हम हंसी की गान सुनाएंगे

पर वक़्त चल गया था अपनी चाल
कम्बख़त शब्दों ने जाने क्या बताया था
रुंधा रुंधा था मां का गला
आंसूओं में खुद को भिगाया था

ऐ शायर, तेरे शब्द वफादार नहीं
तु शायर बनने का हकदार नहीं

क्यों भूल जाता है तु की
मां का दिल नाजुक होता है
बेटे की हर इक आह
मां के दिल पे चाबुक होता है

तु कैसा शायर है
जो मां के दिल को समझ ना सका
तु युंही शब्द लिखता है
तेरी कलम का रस नहीं पका

अब माफ़ी भी मांगेगा तो कैसे
शब्द अब और तेरा खज़ाना नहीं है
कुछ ना कर, बस जा के लगा जा मां के गले
तुझे, मुझे और कुछ समझाना नहीं है।