अंगीठी मन बना

मिट्टी बंटी, देश बना
तन बंटे, भेष बना

मन बंटे, कलह कलेश बना
धर्म के ठेकेदारों ने इस सब को जना

गोली का निशाना, हर एक जन बना
जहां फूलों की थी फुलवारी, वोह जगह अब रण बना

खून में लिपटा और लाल हर कण बना
नफ़रत सुलगी और अंगीठी मन बना।

शक शुबहा है

ना जाने क्यों शक शुबहा है

इस भगवान की कहानी पर
मुझे ना जाने क्यों शक शुबहा है
एक छवि में मर्यादा पुरषोत्तम
और एक में हज़ारों मेहबूबा है

ना जाने क्यों शक शुबहा है

कोई कहें वोह मंदिर मस्जिद
कोई कहें जोगी या सिद्ध
कोई कहता वोह हर जगह है

ना जाने क्यों शक शुबहा है

कोई एक रास्ता दिखाओ मुझको
क्या करना समझाओ मुझको
धर्म के ठकेदरों कर रहे गुमराह है

ना जाने क्यों शक शुबहा है