जब रक्षक ही भक्षक बन जाए

जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तब कौन बचाएं

सदियों से हम किसी ना किसी को मुखिया बनाते रहे
अपनी समझ को इस्तेमाल करने में हिचकिचाते रहे

मुखिया की ही समझ श्रेष्ठ है, इसका क्या प्रमाण है
कभी ना कभी तो वोह भी गलती करेगा, आखिर वोह भी तो इंसान है

मुखिया अपनी ज़िमेदारी भूल चुका है, अब उसकी सरदारी हो गई
और हर मुखिया इससे ग्रस्त हो गया, इतनी भयंकर यह बीमारी हो गई

अब लोगों का पोषण नहीं, बस शोषण होता है
ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे, दीलासो भरा उनका भाषण होता है

समाज को इस महामारी से कैसे मिलेगी निजात
मेरी समझ से तो अब लोगो को ज़िमेदारी लेनी होगी अपने हाथ।

जिस ज़िन्दगी में

जिस ज़िन्दगी में मरने की चाह हो
उस ज़िन्दगी को मैं कैसे ज़िन्दगी कहूं

और जिस घर में होता बेवजह कलह हो
उस घर को मैं कैसे घर कहूं

दोनों ही बिखरने की कगार पर है
मौत आज या कल में दोनों को खाएगी

यह असम्यक बर्बादी बड़ी खतरनाक है
क्या कोई ताक़त इसे रोक पाएगी

कोई रोक भी पाएगा तो कैसे
यह बीस साल पहले शुरू हुआ मंज़र है

विषेले शब्द और वोह कड़वी यादें
आज हाथ में बना यह खंजर है

मौत पहले घर की होगी या ज़िन्दगी की
देखने वालों को बस इसी का इंतजार है

मेरी तरफ़ से तो चाहे कुछ भी हो
दोनों तरफ़ से मेरी ही हार है।