कुछ पल

आरज़ू कुछ और भी है, कहीं दिल कहीं दिमाग है
अरमान कुछ और भी है, पर निकलने को जान है

आखरी सांसों की उधारी, चल रही है यहां
कुछ पलो के बाद जाने, मैं कहां मैं कहां

अरमानों का दम निकले, उससे पहले सुन लो ज़रा
इक दिन भी जिया नहीं मैंने, बस यूंही व्यतीत किया|

शक शुबहा है

ना जाने क्यों शक शुबहा है

इस भगवान की कहानी पर
मुझे ना जाने क्यों शक शुबहा है
एक छवि में मर्यादा पुरषोत्तम
और एक में हज़ारों मेहबूबा है

ना जाने क्यों शक शुबहा है

कोई कहें वोह मंदिर मस्जिद
कोई कहें जोगी या सिद्ध
कोई कहता वोह हर जगह है

ना जाने क्यों शक शुबहा है

कोई एक रास्ता दिखाओ मुझको
क्या करना समझाओ मुझको
धर्म के ठकेदरों कर रहे गुमराह है

ना जाने क्यों शक शुबहा है