तेरे आने को दाता

तेरे आने को दाता
हवा ने बात चलाई है
बरखा ने धरती को धोया है
फूलों ने पगडंडी बनाई है

मां लक्ष्मी ने बल बुद्धि विद्या दे के
मन मंदिर में ज्योति जगाई है
जिभा देहली भी रामा
तेरे ओहो गाद से सजाई है

हर दिए को कहा है दाता
हर दिए को बात बताई है
उनके बुझने से पहले आयोगे तुम
यह उनसे शर्त लगाई है

सारी दुनिया देखने आ रही
की यह रोशनी कहां जगमगाई है
आज मिलने की घड़ी आई है
सांसों में बजी शहनाई है

दाता पग धरो, कृपा करो
दाता पग धरो, कृपा करो
तेरे राज़ तिलक की रामा
शुभ घड़ी आज आई है

सांसों में बजी शहनाई है। – 2

एक हम ही हुए बेघर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है
अनजान शहर में प्यारे, एक हम ही हुए बेघर है

सब को बताया, सब ज़ोर लगाया
पर हुआ ना कुछ, सब बेअसर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है

आज दिन हुए है आठ, मुझे लग रहे है साठ
चौंसठ के चोकड़े में, बस कुछ इधर उधर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है

अब कहां हम है जाए, हर जगह बड़ गए है किराए
शेयरिंग करने में भी लोग दिखाते है नखरे, और करते अगर मगर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है

नोबत है अब यह आई, मंदिर में रात बिताई
समझाते मन अपने को, की मीठा फल सबर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है।