रे ओ श्यामा

रे ओ श्यामा, रेे ओ प्यारे
ना जाने कब मिल होगा
पुकारते है हम चारों पहर
ना जाने कब तेरा दिल होगा

शिकायत मैं नहीं करता
बहाने तुम बनाते हो
कभी किस्मत, कभी बन्धन
कर्मो का बताते हो

अगर तुम ज़िद के पक्के हो
तो कम हम भी है कहां
धरा पर मिल ना पाए गर
तो मिलने आएंगे तू जहां

मन की दशा

चुभते है कांटे पर दवा नहीं है
गहरे है ज़ख्म पर कोई गवाह नहीं है

खोलता है दिल मुझे अपनो की फिक़र है
कांटो से छलनी छलनी हुआ यह ज़िगर है

आहो मैं कटते है मेरे दिन और रात
चोट खाए इस दिल में है गहरे जज़बात

शब्दों के दीलासो में अब असर नहीं है
क्या कर जाए कोई ख़बर नहीं है।

08.08.2013