आंखों के आंसू अब गिरते नहीं है

पत्थर दिल हो जा ए मुसाफ़िर
जीना यहीं है
जग ने कहीं है
शायद सही है

आंखों के आंसू अब गिरते नहीं है

ना कोई है अपना
ना कोई पराया
ठोकरों ने जग की, है यही समझाया
सूने पलो के कांटे अब चुभते नहीं है

आंखों के आंसू अब गिरते नहीं है

ज़ख्मों का क्या है विशाल
वोह तो भर ही जाएंगे
थोड़ा और मजबूत, तुम्हें कर ही जाएंगे
ज़ख्म पुराने, अब दुखते नहीं है

आंखों के आंसू अब गिरते नहीं है

उम्र का तजुर्बा यही है विशाल
मुरझाने के बाद, फूल खिलते नहीं है

आंखों के आंसू अब गिरते नहीं है

ज़िन्दगी समझ जाएगी

ज़िन्दगी तो कोरा कागज़ है
कुछ भी लिख दो, यह तो समझ जाएगी

मान लेगी उसे अपनी किस्मत
और उसे सुधारने में लग जाएगी

राही तु डगर पर पांव तो रख
मंजिल ख़ुद-बा-ख़ुद तुझे नज़र आएगी

यूहीं लंबी लगती है डगर तुझको
कुछ घड़ियों में ही यह गुज़र जाएगी

गर कभी थोड़ी खुशियां, ज़्यादा गम हो
तो देख लेना उनके, जिनसे तुम्हारे कम हो
उन के देखते ही, ख़ुद के यह भूल जाएगी

ज़िन्दगी ना रुकती है, ना तुम रुकना
गर लगा के तुम हारे, फिर भी ना झुकना
चलते चलते यह ख़ुद ही संभल जाएगी

गर समझ कर जिये, जैसे जीना है
तो हर दिन उजियारा और रात पूर्णिमा है
फिर तो मौत भी पूछ कर आएगी

ज़िन्दगी तो कोरा कागज़ है
कुछ भी लिख दो, यह तो समझ जाएगी।