थोड़े शब्दो में गहरी बात कह जाना, वो तजुर्बा है
गुस्सा बहुत हो पर चुप रह जाना, वो तजुर्बा है
भूख जितनी हो उससे थोड़ा कम ही खाना, वो तजुर्बा है
अपनी रोटी का एक हिस्सा किसी भूखे को खिलाना, वो तजुर्बा है
मां बाबा के कहे बिना उनके पांव दबाना, वो तजुर्बा है
घर जाते समय बच्चों के लिए कुछ ले जाना, वो तजुर्बा है
घर के सूरत–ए–हाल दुनिया को ना दिखालाना, वो तजुर्बा है
बाहर की उलझनों को घर पर ना ले आना, वो तजुर्बा है
अपना समय अच्छे लोगों की संगत में लगाना, वो तजुर्बा है
ज़िंदगी को कोशिशों से कल से बेहतर बनाना, वो तजुर्बा है
चकाचौंध की जिंदगी से ख़ुद को बचाते चलेजाना, वो तजुर्बा है
किसी की मदद करते समय उसको ना जतलाना, वो तजुर्बा है
ख़ुद को याद दिलाते रहना की पता नहीं हमें कब चले जाना, वो तजुर्बा है
आखिरी घड़ियों में रब का शुक्रिया करना और मुस्कुराना, वो तजुर्बा है
Author: Vishal Gupta
मजबूरियां
मुश्किल हालातों ने मजबूरियों को रहने की जगह क्या दी जिंदगी में,
की अब वोह जाने का नाम ही नहीं ले रही है।
हर बार कोई न कोई बहाना बता के,
कुछ देर ओर की मोहलत मांग कर ठहर जाती है।
इस दफ़ा तो कोई बहाना सुनने वाला नहीं हूं मैं,
हाथ पकड़ कर निकाल बाहर करने वाला हूं मैं।
पर मेरी ताक़त-ए-परवाज़ कुछ कम है इन दिनों,
बस इसी मजबूरी के चलते कुछ कह नहीं पाता हूं मैं।
मजबूरियों ने चारो तरफ से ऐसे घेरा है मुझे,
के बेबस और लाचार सा महसूस करता हूं खुद को।
ए मेरे मौला, अब तू ही इमदाद कर मेरी,
मुझे मेरी सब मजबूरियों से निजात दिला दे।
इंसान बना के भेजा था ना तूने मुझे मेरे मौला,
मेरे अंदर बैठा वो इंसान बस जगा दे।
जगा यकीन अपने रहम-ओ-करम का मेरा अंदर मौला,
मेरे अंदाज-ए-नज़र मैं असर बड़ा दे।
मजबूरियों को बदल दे कोशिशों में मेरी,
मुझे मेरी मंजिल-ए-आराम तक पहुंचा दे।।

