मेरी मां

मेरी सजावत से क्या
मेरी सजावत भी तुम हो
मेरी इबादत भी तुम हो

तुम ही हो जन्नत के नज़ारे
तुम ही हो दिल जिसे पुकारे

तुम ही हो वोह न्यारी मूरत
तुम ही हो सबसे ख़ूबसूरत

करुणा, दया, प्यार और ममता तुम से झलकती है
तुम्हे याद करते हुए, पलक तक ना झपकती है

तुम उन ऋषियों की तपस्या हो, जो प्रभु को पाना चाहते है
तुम समंदर का वोह क्षितिज हो, जिसमें सूरज डूब जाना चाहते है

तुम वोह हो जिसमें मेरा मन, हर पल ही पल सुख पाता है
तुम हो मेरी मां, जिसे देखकर मेरा दिल मुस्कुराता है।

होंगी कृष्ण संग गोपिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधे ब्रज मा बैठी बिलके
गए नहीं कृष्ण इस बार भी मिलके
काटे थे दिन मैंने गिन गिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

पूछूंगी कहां अब तक दिन बिताए
मिलने तुम इतने दिन से ना आएं
हुआ तुमसे मिलने कठिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जाने कहां वोह रास रचाए
गोपियों का मन कृष्ण पे आए
कृष्ण तो है भी चंचल मन, कमसिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जब कोई गोपी कृष्ण को छूती
दिल करता उसे कर दुं विभुति
कृष्ण बस मेरे ही स्वामीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

काश मैं होती कृष्ण के संग
देख लेती सवारें के रंग
राधा तड़पे जैसे पानी बिन मीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

यह सब सोच रही थी राधा रानी
पीछे सुनी कान्हा को वाणी
मुड़ देखा, खड़े रसलीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधा की सुध बुध सी खो गई
कृष्ण को देख बस मस्त सी हो गई
कृष्ण कहें की राधा तेरे ही आधीन

संग नहीं थी कोई गोपीन।