मन मुझे ख़ौफ दिखता है
आने वाले कल की मुश्किलें बताता है
आने वाले कल की मुश्किलें बताता है
कहता है कि जब सब जी रहे है इसी तरह
तो क्या सच मुच सही है मेरा दूसरी राह खोजना
कहीं भटक ना जाना, कहीं भटक ना जाना
यह कह कह कर भटकाता है
हूं शुभ चिंतक मैं तुम्हारा
यह कह कर भरमाता है
पर मुझे इस चपल मन की चतुराई का ख़ूब अंदाज़ा है
क्यूंकि इसकी बातों में आकर, खाई ठोकरों के जख्म अभी ताज़ा है
बहुत बार इसकी बातों मैं आ चुका हूं मैं
इसके पीछे चल के ख़ूब ठोकरें खा चुका हूं मैं
अब प्रकाश की इक किरण पकड़ कर
सूरज की तलाश में चलूंगा मैं
खोज अब उसकी ही होगी
चाहे पास जाने पे जलुंगा मैं ।

