दगाबाज़ी

तुम्हें तो शायद लोगों ने
मगर हमें तो उस ख़ुदा ने ठगा है
चोरों से बचना तो आसान है मगर
उससे बच सके ऐसी कौन जगह है

बड़े आराम से हमतो
जीवन की नींद में मस्त थे
अपने लिए ही जीते थे हमतो
चाहे औरों के लिए मतलब परस्त थे

इक दिन इसी आराम के माहौल से हमें
पकड़ कर ले गए इसके सिपाही
ना था कोई वकील, ना था कोई गवाह
और ना ही हुई कोई सुनवाही

कह दिया कि तुम मुज़रिम हो
और यह है सजा़ तुम्हारी
यह कैसा इंसाफ है इनका
किसी ने बात भी नहीं सुनी हमारी

वक़्त आने की देरी है

वक़्त आने की देरी है

सोचा तो यह था कि मैं ही मैं हो जाऊंगा
अकेले होने की परवाह नहीं थी मुझे
जानता था कि इक दिन मैं कारवां हो जाऊंगा

बस, वक़्त आने की देरी है

शायद वक़्त वक़्त की बात है
उस वक़्त हम भी जवां थे और वक़्त भी जवां था
मेरे मन का होंसला यूहीं नहीं बना
बन्दा बन्दा मेरी काबिलियत का गवाह था

यह तो नामुराद शरीर है
जिसने हमारा साथ ना दिया
लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट अभी थमी भी ना थी
की इसने हमें गिरा भी दिया

मौत के बिस्तर पर समय ने
एक बात दिमाग़ में भर भर के डाली
की कुछ भी करलो जाना होगा
और हाथ होंगे बिल्कुल खाली

जाते हुए, जेबों में भर सकु
ऐसा धन जुटाना है मुझे
इस बार का ही क्यूं सोचूं
अगली बार भी तो आना है मुझे

शायद यह दिले तमन्ना तब पूरी हो जाए
तब का इंतजार रहेगा
इस बार चुके तो कोई गिला नहीं
अगली बार हर कोई हमें ही शानदार कहेगा