जादू की नगरी

यह दुनिया है उल्फत
जादू की नगरी

यहां नए है नज़ारे
हर एक नई है डगरी

यह काला है जादू
ना इसका कोई तोड़

यह सर चड़ के बोले
ना जाया जाए भी छोड़

यह पागल बना के
नचाए अपने इशारे

यहां आके हमने सीखा
क्या हमारे, क्या तुम्हारे

कहते जग को कविता
पर किस ने रची है

यह किसने रची है

पर जैसी भी है
यहां जी लेते है लोग

जब कुछ मिलकर बिछड़ता
कर लेते है शोक

कुछ अपने है, कुछ पराए भी
जो खिले थे कभी वोह मुरझाए भी

जाना सब को है यहां से
कहते चलती चक्री है

दुनिया जादू की नगरी है