मन की आशा और निराशा

मन की आशा और निराशा, दोनों मन की ही संतान रे
मन में ही उत्पन होती है, और मन को ही करती परेशान रे

पल पल कर जीवन को रहती खाती
तेल तो रहता, पर जल जाती बाती

कितने लोग इस तरह, समय से पहले ही गुज़र गए
कितने सूरज की तरह तो चढ़े, पर दोपहर में ही उतर गए

मन को सुधार, जग सुधरेगा
राग द्वेष निकाल, सब सुधरेगा

मन के प्रांगण को धो, लेकर समता का पानी
करके को देख ज़रा रे प्यारे, इसमें कोई नहीं है हानि

उजला चित, उजला व्यक्तित्व, उजली होगी पहचान रे
जो जीवन लगता था बोझल सा, होगा जीना आसान रे

मन निर्मल हो, आनंदित हो, ना रहे राग द्वेष का रोग रे
मन की परते खोल रे, अमृत रस फिर तु भोग रे।

01.03.2013

मां

जिस मां के है बच्चे हम सब
उसको तुमने धुतकारा था
उस मां के दिल से पूछो
की कैसे उसने उन शब्दों को सहारा था

ख़ुद गिले में सो कर
तुमको सूखे में सुलाया था
क्या भूल गए उस कर्ज़ को
जो आज तक ना चुकाया था

कितने सपने उसने सजाए थे
एक महल सपनो का बनाया था
अब उसके सारे सपने टूट गए
जब मां से ही बच्चे रूठ गए

मां के दिल का क्या था हाल
शब्द ना कर पाएंगे उसका व्याखान

उस लड़के के दोस्त ने उसे समझाया था
की जा कर पूछो उन बच्चों से
जिन्होंने जीवन में मां का प्यार ना पाया था

जब बचपन कि याद आई
दिल के तार खनक उठे
की किस तरह मुझको पाला था
मुझ गिरते को संभाला था

अब मां का मोल वोह समझ गया
पर नज़रों से अपनी ही गिर गया

सोचा कि अब मां के सामने कैसे जयुंगा
किस तरह मुंह दिखाऊंगा

होंसला कर के मां के सामने गया वोह जब
मां के आंसू निकले तब

बेटे को गले से लगाया था
पुराना सब भुलाया था।