जिंदगी सार्थक कर दे ए मौला,
मुझे सलीके से जीने का मौका दे।
नई तय कर मेरे जीवन की ऊंचाइयां,
जिंदगी में नई तमनाओ का झोंका दे।
बारीशे कर इल्म-ओ-हुनर की मुझ पर,
मुझे नई बुलंदियों पर पहुंचा दे।
मैं ऊपर उठू तेरे रहम-ओ-करम से मेरे मौला,
मेरे जीवन को जन्नत बना दे।
हटा मेरे सर से बोझ सभी फिकरों का,
मुझे सकून से जीना का सलीका दे।
और मिटा दे मेरे जेहन से, जो भी बुरा सीखा है मैंने,
मुझे प्यार के, इबादत के, दो लफ्ज़ सीखा दे।
मैं खोजू तुझ को और तुझी से ही मिल जायूँ,
यही मेरी जिंदगी की मंजिल तू बना दे।
इमदाद कर तू यही मेरे मौला,
मैं मिल सकूं तुझ से, मुझे इतना काबिल तू बना दे।
मुझे तुझसे(खुदसे) मिलने का मौका दे।।
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मुक्ति
गर ना करो कोई इच्छा
तो मुक्त हो तुम
मान लो कथन यह सच्चा
तो मुक्त हो तुम
मन ही है,
जो तुम्हे भटकाए
असल को छुड़वा,
अपने पीछे लगाए
जब छोड़ो पीछा इसका,
तो मुक्त हो तुम
गर ना करो कोई इच्छा
तो मुक्त हो तुम
पर मन से परे हम,
कैसे है जाए
हर जगह इसने,
अपने सिपाही बिठाए
जो पकड़ो सांस का रस्ता,
तो मुक्त हो तुम
गर ना करो कोई इच्छा
तो मुक्त हो तुम
देखते देखते यह,
सिमटता है जाए
मिटने से पहले जब,
मन आंखें टिमटिमाए
ध्यान रहे तब पक्का,
तो मुक्त हो तुम
गर ना करो कोई इच्छा,
तो मुक्त हो तुम
गहन नींद में जब,
यह खो जाए
गर तब भी तुम,
अगर ना डगमगाए
जैसे ही मैं ने मैं को देखा,
तो मुक्त हो तुम
गर ना करो कोई इच्छा,
तो मुक्त हो तुम
असल को तुम,
जब पहचानोगे
तुम क्या हो,
तुम यह जानोगे
मिट जाएगा कर्मों का लेखा,
तो मुक्त हो तुम
गर ना करो कोई इच्छा, तो मुक्त हो तुम

