कितना सहे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

क्या कटु बोलना प्रेमी का अधिकार है
फिर क्यूं उसके शब्द मुझे लगे तिरस्कार है
मोहब्बत की इस कड़ी को हम क्यों ना समझ सके

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

क्या कटु सुनने में छुपा हमारा भला है
फिर क्यों उन शब्दों से कलेजा मेरा जला है
जलने का डर मुझे कर रहा तुम से परे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

फूलों के संग भी लगे हज़ारों कांटे है
क्या यही सोचकर तुमने अपने शब्द छांटे है
मेरे मन उन नोकीले कांटो से बहुत है डरे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

कैसे समझाए मन को की कटु बोलना तुम्हारी आदत है
उन शब्दों में भी छुपी मेरे लिए तुम्हारी इबादत है
मन की इस उलझन को कैसे दूर करें

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

30.03.2009

मन की सफ़ेद चादर पर

मन की सफ़ेद चादर पर
जो पड़ गए है निशान
वोह आंसु भी ना धो पाएंगे

रिश्तों के इस समुन्द्र में
जो आ गए है तूफ़ान
वोह सब मिटा कर जायेंगे

मन की सफ़ेद चादर पर….

मन पर विचारों के पहाड़ है
नर्म मिट्टी पर, डाला कितना भार है
फटने को है कलेजा बस
अब और सह नहीं पाएंगे

मन की सफ़ेद चादर पर….

उम्रदराज़ होते, तो मौत का इंतजार होता
कुछ पल हंसी के जीने को, मन ना बेकरार होता
पर भरी जवानी में, मौत को कैसे गले लगाएंगे

मन की सफ़ेद चादर पर….

ऐ ख़ुदा अब हिम्मत दे
कितने ही किए है कर्म, एक इमदाद और कर दे
कारण बना दे मेरे जाने का, ख़ुद ही ख़ुद को ना मिटा पाएंगे

मन की सफ़ेद चादर पर….

08.08.2013