चुभते है कांटे पर दवा नहीं है
गहरे है ज़ख्म पर कोई गवाह नहीं है
गहरे है ज़ख्म पर कोई गवाह नहीं है
खोलता है दिल मुझे अपनो की फिक़र है
कांटो से छलनी छलनी हुआ यह ज़िगर है
आहो मैं कटते है मेरे दिन और रात
चोट खाए इस दिल में है गहरे जज़बात
शब्दों के दीलासो में अब असर नहीं है
क्या कर जाए कोई ख़बर नहीं है।
08.08.2013

