क्या है ज़िन्दगी – 2

क्या है ज़िन्दगी?
कुछ भी तो नहीं
बेचारी सांसों की मोहताज़ है

भर्ती है, रोकती है, छोड़ देती है
क्यूंकि अगले सांस की आस है

इसी कशमकश को ज़िन्दगी कहते है
किराए के इस मकान में
ऊपर के चोबरे मैं हम रहते है।

क्या है ज़िन्दगी

बेमतलबी पन्नों पर, बेमतलबी शब्दों की कतारों का नाम ज़िन्दगी है

मैं को बचाने के लिए, खड़ी करी दीवारों का नाम ज़िन्दगी है

असल क्या है, यह तोह नहीं पता ऐ विशाल

पर लगता है, कि इकठ्ठे किए हुए विचारों का नाम ज़िन्दगी है।