क्या है ज़िन्दगी?
कुछ भी तो नहीं
बेचारी सांसों की मोहताज़ है
कुछ भी तो नहीं
बेचारी सांसों की मोहताज़ है
भर्ती है, रोकती है, छोड़ देती है
क्यूंकि अगले सांस की आस है
इसी कशमकश को ज़िन्दगी कहते है
किराए के इस मकान में
ऊपर के चोबरे मैं हम रहते है।

