दस्तूर-ए-ज़िन्दगी

दस्तूर-ए-ज़िन्दगी बहुत अजीब है
कहने को ज़िंदा है मगर
मौत के करीब है

ना जाने बनाने वालों ने हमें क्यों बनाया
छोड़ दिया इस काली नगरी में
और कुछ ना समझाया

अब दिन कटते नहीं मेरे, परेशान हुं
जानवरों का सा जीवन जी रहा हुं
और पुछु
क्या में सच मुच इंसान हुं।

मक़सद-ए-मगरूर

वोह मक़सद-ए-मगरूर है
अल्लाह से कितना दूर है

वोह नादान है, नापाक है
घरों में पलते सांप है
मुर्शद मुरीद की मौत पर
कहते की मिलती हूर है

वोह मक़सद-ए-मगरूर है
अल्लाह से कितना दूर है

इंसाफ कर, हिसाब कर
इंसाफ कर, मौला आज कर
यह कयामत का क्या दस्तूर है

वोह मक़सद-ए-मगरूर है
अल्लाह से कितना दूर है

मौला ज़िन्दगी, पर सकून नहीं
मौला मस्जिदें, पर तु नहीं
यह कैसी अंधेरी रात है
जो हर इंसान नशे में चूर है

वोह मक़सद-ए-मगरूर है
अल्लाह से कितना दूर है