मेरे इशारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी झूमती, कभी नाचती
साज़ की बजती तारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है हंसती, कभी है रोती
अपने खुद के विचारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी दमकती, कभी चमकती
अपने खड़े किए मीनारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है जलती, कभी है बुझती
व्यंग कसती अंधकारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है चड़ती, कभी उतरती
आ कर रुकती, किनारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है खिलती, कभी मुरझाती
छा जाती है बहारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी बरसती, कभी गरजती
खुशियां बिखेरे हज़ारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी सिमटती, कभी बिखरती
बनती तस्वीर दीवारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर।

01.04.05

रास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

अजनबी शहर को टटोलता रहा, बुलाया पर कोई पास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

बहुत उम्मीद लगाई थी इस सफ़र से, चलता रहा पर परवाज़ ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

याद भरी आंखें आंसुं बहाए, सिसकियां ली पर सांस ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

लोगों का जीवन खुदगर्ज़ी से भरा है, बहुत कोशिश की पर यह अंदाज़ ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

दो पल खुल के जीना चाहता था, आज़ादी मिली पर उलास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

पर हारना मेरी और ज़िन्दगी की पहचान नहीं, कोन नहीं जिसके जीवन में बनवास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया

ज़ख्म खाए है पर होंसला बुलंद है, विशाल ऐसा बना की लोगों को विश्वास ना आया

मुझे घर से निकलना रास ना आया