मसला

कुछ डरा सा हूं, कुछ होंसला भी है
क्या महसूस करू, मसला यही है

कुछ दूर से मुझे कुछ, दिख तो रहा है
क्या वोह सच में है सूरज, या कोई टॉर्च जली है
कैसे बताऊं, मसला यही है

मैं डरता नहीं हूं, खुद को बहुत बार बोला
आखिर डर छुपता कहां है, कोना कोना खंगोला
है भी और मिलता नहीं है, मसला यही है

समय उसी और भागा है जाए
कैसे रोकू इसे, क्या करू उपाय
रेस तोह है मगर ब्रेक नहीं है, मसला यही है

ख़ामोशी

बहुत दिनों से खामोश थी
आज अचानक क्यों इतना कुछ कह रही है

जो चन्द शब्द लिख के ही थक जाती थी
आज वोह नदी की तरह बह रही है

ऐ कलम क्या हुआ है तुझे, कहां से इतनी स्याही इकट्ठी की है
कहीं यह उन दुखते पलों के आंसुओ की बनी स्याही तो नहीं है

तोह कह ले जो कहना है, मैं तेरा एक एक शब्द सुनूंगा आज
तेरे साथ चलूंगा मैं, तेरे मन में चुभे कांटे को चुनूंगा आज

तू कह के, मन अपना खाली करले
फिर लगा कानों पे ताला, उस मन की रखवाली करले

क्यूंकि दुनिया वाले, किसी के लिए कुछ अच्छा कहते नहीं
और जो समझदार है, वोह उनकी बातों में बेहते नहीं

तो अब से तुम भी ना बहना
कोई कुछ भी कहे, तुम शांत ही रहना

यही ज़िन्दगी का फलसफा है, यही सच्चाई है
अरे दुनिया वालों ने तोह, राम पर भी उंगली उठाई है।