कुछ यादें

कुछ यादें, कुछ लम्हें
कुछ बातें अनकही

कुछ अपना छोड़ के
कुछ रस्ते मोड़ के

मैं अपने घर से निकाल तोह पड़ा
सोच कर कि सामने सुनहेरा भविष्य है खड़ा

यहां आकर देखी काली रात
पर याद आई घरवालों की समझाई बात

की कुछ भी हो ना घबराना
जो करने गए हो, उसे पूरा कर के ही आना।

वो तजुर्बा है

थोड़े शब्दो में गहरी बात कह जाना, वो तजुर्बा है

गुस्सा बहुत हो पर चुप रह जाना, वो तजुर्बा है

भूख जितनी हो उससे थोड़ा कम ही खाना, वो तजुर्बा है

अपनी रोटी का एक हिस्सा किसी भूखे को खिलाना, वो तजुर्बा है

मां बाबा के कहे बिना उनके पांव दबाना, वो तजुर्बा है

घर जाते समय बच्चों के लिए कुछ ले जाना, वो तजुर्बा है

घर के सूरत–ए–हाल दुनिया को ना दिखालाना, वो तजुर्बा है

बाहर की उलझनों को घर पर ना ले आना, वो तजुर्बा है

अपना समय अच्छे लोगों की संगत में लगाना, वो तजुर्बा है

ज़िंदगी को कोशिशों से कल से बेहतर बनाना, वो तजुर्बा है

चकाचौंध की जिंदगी से ख़ुद को बचाते चलेजाना, वो तजुर्बा है

किसी की मदद करते समय उसको ना जतलाना, वो तजुर्बा है

ख़ुद को याद दिलाते रहना की पता नहीं हमें कब चले जाना, वो तजुर्बा है

आखिरी घड़ियों में रब का शुक्रिया करना और मुस्कुराना, वो तजुर्बा है