होंगी कृष्ण संग गोपिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधे ब्रज मा बैठी बिलके
गए नहीं कृष्ण इस बार भी मिलके
काटे थे दिन मैंने गिन गिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

पूछूंगी कहां अब तक दिन बिताए
मिलने तुम इतने दिन से ना आएं
हुआ तुमसे मिलने कठिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जाने कहां वोह रास रचाए
गोपियों का मन कृष्ण पे आए
कृष्ण तो है भी चंचल मन, कमसिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जब कोई गोपी कृष्ण को छूती
दिल करता उसे कर दुं विभुति
कृष्ण बस मेरे ही स्वामीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

काश मैं होती कृष्ण के संग
देख लेती सवारें के रंग
राधा तड़पे जैसे पानी बिन मीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

यह सब सोच रही थी राधा रानी
पीछे सुनी कान्हा को वाणी
मुड़ देखा, खड़े रसलीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधा की सुध बुध सी खो गई
कृष्ण को देख बस मस्त सी हो गई
कृष्ण कहें की राधा तेरे ही आधीन

संग नहीं थी कोई गोपीन।

रिश्तों की समझ

रिश्तों की तुम्हें समझ नहीं, अपनों की पहचान नहीं
घर की तुम्हें कद्र नहीं, घरवालों का मान नहीं

मन की ग़ुलाम हो तुम, ज़िम्मेदारी से अनजान हो तुम
न जाने किस ख़ुशी को ढूंढ रही हो, अपने आप से ही अनजान हो तुम

इसीलिए परेशान होती हो और परेशान करती हो तुम
मन को ना जाने किन किन विचारों से भरती हो तुम

खुश नसीब हो, की रखने वालो ने रखा है
बड़ी मुश्किल से इन्होंने अपने मन को किया पक्का है

अब इम्तिहान ना लो इनका, सब्र का सब्र भी टूट जाता है
इस खामोशी को इनकी कमज़ोरी ना समझो, यह तूफ़ान से पहले का सन्नाटा है

अल्लाह के बन्दों को जिस ने भी कभी छेड़ा, वोह सरे-आम चौराहों पर लुट जाते है
अहम् टूट जाते है, अहम् टूट जाते है