मजबूरियां

मुश्किल हालातों ने मजबूरियों को रहने की जगह क्या दी जिंदगी में,
की अब वोह जाने का नाम ही नहीं ले रही है।

हर बार कोई न कोई बहाना बता के,
कुछ देर ओर की मोहलत मांग कर ठहर जाती है।

इस दफ़ा तो कोई बहाना सुनने वाला नहीं हूं मैं,
हाथ पकड़ कर निकाल बाहर करने वाला हूं मैं।

पर मेरी ताक़त-ए-परवाज़ कुछ कम है इन दिनों,
बस इसी मजबूरी के चलते कुछ कह नहीं पाता हूं मैं।

मजबूरियों ने चारो तरफ से ऐसे घेरा है मुझे,
के बेबस और लाचार सा महसूस करता हूं खुद को।

ए मेरे मौला, अब तू ही इमदाद कर मेरी,
मुझे मेरी सब मजबूरियों से निजात दिला दे।

इंसान बना के भेजा था ना तूने मुझे मेरे मौला,
मेरे अंदर बैठा वो इंसान बस जगा दे।

जगा यकीन अपने रहम-ओ-करम का मेरा अंदर मौला,
मेरे अंदाज-ए-नज़र मैं असर बड़ा दे।

मजबूरियों को बदल दे कोशिशों में मेरी,
मुझे मेरी मंजिल-ए-आराम तक पहुंचा दे।।

नाकामयाबीयां

मेरी नाकामयाबीयां बस मेरी ही है
मैं ही हूं जो की हंसता रहा, मुस्कुराता रहा
यह कह के, की अभी तो वक्त बहुत बाकी है

जो भी यह बिखरी चीजे है, यह सब मेरी है
मैं ही था जो बेपरवाह होकर इनको गिरता गया
यह सोच के, की अभी तो वक्त बहुत बाकी है

मैं अपने आप को कहता रहा की संभलना क्यों है
थोड़ी देर और इसी नशे में रहने दो खुद को
क्योंकि अभी तो वक्त बहुत बाकी है

मुझे सच में यकीन था कि बहुत वक्त है पास मेरे
उन कीमती पलो के सिक्के को मैं लुटाता गया
यह सोच के, की अभी तो वक्त बहुत बाकी है

आज मेरे हाथों मैं वक्त की लकीरे हैं और कुछ भी नही
सब आगे बड़ गए, मेरे पास खड़ा कोई भी नहीं
अब लगता है की निकल गया सारा वक्त, कहां बचा कुछ बाकी है

मेरी नाकामयाबीयां बस मेरी ही है
मैं ही हूं जो की हंसता रहा, मुस्कुराता रहा
यह कह के, की अभी तो वक्त बहुत बाकी है