वक़्त

वक़्त का दस्तुर भी अज़ब निराला है
कभी गिराया और कभी इसी ने संभाला है

यूं तो कायर है, पल पल करके सामने आता है
अतीत की चुभन और भविष्य की फ़िकर, इन दोनों में ही भरमाता है

कभी कमजोर तो कभी बलवान जान पड़ता है
जहां कदर नहीं, वहां तो भरपूर है मगर, कहीं चंद घड़ियां देने में भी अखरता है

मैं इसके रूबरू होना चाहता हूं
मैं इसे बेपर्दा करना चाहता हूं

पर जब भी मुशक्कत करता हूं, कहीं दूर पहुंच जाता हूं
असल को छोड़कर, बेमतलबी गालियों में जरूर पहुंच जाता हूं

पर ज़िद है मेरी, की इक बार तो सामना हो
जिस वक़्त ने चलाया तय ज़िन्दगी, उस वक़्त का कुछ तो जानना हो
इक बार तो सामना हो।

24.02.2015

वक़्त आने की देरी है

वक़्त आने की देरी है

सोचा तो यह था कि मैं ही मैं हो जाऊंगा
अकेले होने की परवाह नहीं थी मुझे
जानता था कि इक दिन मैं कारवां हो जाऊंगा

बस, वक़्त आने की देरी है

शायद वक़्त वक़्त की बात है
उस वक़्त हम भी जवां थे और वक़्त भी जवां था
मेरे मन का होंसला यूहीं नहीं बना
बन्दा बन्दा मेरी काबिलियत का गवाह था

यह तो नामुराद शरीर है
जिसने हमारा साथ ना दिया
लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट अभी थमी भी ना थी
की इसने हमें गिरा भी दिया

मौत के बिस्तर पर समय ने
एक बात दिमाग़ में भर भर के डाली
की कुछ भी करलो जाना होगा
और हाथ होंगे बिल्कुल खाली

जाते हुए, जेबों में भर सकु
ऐसा धन जुटाना है मुझे
इस बार का ही क्यूं सोचूं
अगली बार भी तो आना है मुझे

शायद यह दिले तमन्ना तब पूरी हो जाए
तब का इंतजार रहेगा
इस बार चुके तो कोई गिला नहीं
अगली बार हर कोई हमें ही शानदार कहेगा