बिना सांसों के

चंद घड़ियां ही बाकी है इस तमाशे की
देखने वालों की धड़कनों को थमाना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

मिट्टी के घरों मैं तो बहुत रह लिए हम
अब दिलों में अपना आशियाना बनाना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

अब तो आखरी सांस का भी डर नहीं
मौत के सामने भी मुस्कुराना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

और कौन है जो गया नहीं
इस महफ़िल में तो आना जाना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

मस्ती से निकलूंगा अपनी सवारी पर
सुना है कि वोह सफ़र बहुत सुहाना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

यहां रुक कर भी क्या करोगे ऐ विशाल
यह तो सराए है, ना की तेरा ठिकाना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

उड़ान भरों और खुल के जियो तुम
मौत को भी शर्मिंदा कर जाना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

मोहब्बत करो हर किसी से
हर खुशी एक नज़राना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

समझ लो इस खेल को अच्छी तरह प्यारे
कुदरत को यह खेल तुम्हे कितनी बार खिलाना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

जान लो सब दांव पेंच इसके
हमें उसके खेल में उसी को हराना है

बिना सांसों के हमें जी कर दिखाना है

आंदोलन

मंदिर मेहलों से सजे है
लोग लिए खड़े ध्वजे है
फिर भी शांति क्यों नहीं

और लोग बदलने को तैयार है
सड़को पर खड़े मांग रहे अधिकार है
फिर भी क्रांति क्यों नहीं

कुछ इसी तरह के सवाल
पीछले पच्चीस वर्षों से पूछ रहा हूं
नैतिक ज़िम्मेदारी और निजी स्वार्थ
इन दोनों मै ही जूझ रहा हूं

यह वही सवाल है जो की
सदियों से पूछे जा रहे हैं
कोई भी इन से अछूता नहीं है
यह हर किसी के ज़हन में आ रहे है

पर समाज की बुनियाद पर
कैसे पड़े प्रभाव
यह बात जानने लायक है
मिलके खो़जते है हम और आप

ख़ोजा तो पाया कि इंसान का जीवन
पेट की भूख से बंधा है
बदलना और करना तो हर कोई बहुत कुछ चाहता है
पर जरूरते ज़िन्दगी में ही फसां है

थाली की रोटी में ही छूपी
इंसान की क्रांति और शांति है
इसी के लिए मंदिरों में गर्दनें झुकती है
और जनता सरकारों को मानती है

फिर तो जिस दिन थाली में से रोटी जाएगी
उसी दिन इंसान करहाएगा
उस दिन एक नया गांधी पैदा होगा
और मेरे देश में आंदोलन आएगा।