होंगी कृष्ण संग गोपिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधे ब्रज मा बैठी बिलके
गए नहीं कृष्ण इस बार भी मिलके
काटे थे दिन मैंने गिन गिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

पूछूंगी कहां अब तक दिन बिताए
मिलने तुम इतने दिन से ना आएं
हुआ तुमसे मिलने कठिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जाने कहां वोह रास रचाए
गोपियों का मन कृष्ण पे आए
कृष्ण तो है भी चंचल मन, कमसिन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

जब कोई गोपी कृष्ण को छूती
दिल करता उसे कर दुं विभुति
कृष्ण बस मेरे ही स्वामीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

काश मैं होती कृष्ण के संग
देख लेती सवारें के रंग
राधा तड़पे जैसे पानी बिन मीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

यह सब सोच रही थी राधा रानी
पीछे सुनी कान्हा को वाणी
मुड़ देखा, खड़े रसलीन

होंगी कृष्ण संग गोपिन

राधा की सुध बुध सी खो गई
कृष्ण को देख बस मस्त सी हो गई
कृष्ण कहें की राधा तेरे ही आधीन

संग नहीं थी कोई गोपीन।

आंदोलन

मंदिर मेहलों से सजे है
लोग लिए खड़े ध्वजे है
फिर भी शांति क्यों नहीं

और लोग बदलने को तैयार है
सड़को पर खड़े मांग रहे अधिकार है
फिर भी क्रांति क्यों नहीं

कुछ इसी तरह के सवाल
पीछले पच्चीस वर्षों से पूछ रहा हूं
नैतिक ज़िम्मेदारी और निजी स्वार्थ
इन दोनों मै ही जूझ रहा हूं

यह वही सवाल है जो की
सदियों से पूछे जा रहे हैं
कोई भी इन से अछूता नहीं है
यह हर किसी के ज़हन में आ रहे है

पर समाज की बुनियाद पर
कैसे पड़े प्रभाव
यह बात जानने लायक है
मिलके खो़जते है हम और आप

ख़ोजा तो पाया कि इंसान का जीवन
पेट की भूख से बंधा है
बदलना और करना तो हर कोई बहुत कुछ चाहता है
पर जरूरते ज़िन्दगी में ही फसां है

थाली की रोटी में ही छूपी
इंसान की क्रांति और शांति है
इसी के लिए मंदिरों में गर्दनें झुकती है
और जनता सरकारों को मानती है

फिर तो जिस दिन थाली में से रोटी जाएगी
उसी दिन इंसान करहाएगा
उस दिन एक नया गांधी पैदा होगा
और मेरे देश में आंदोलन आएगा।