मुझे घर से निकलना रास ना आया
अजनबी शहर को टटोलता रहा, बुलाया पर कोई पास ना आया
मुझे घर से निकलना रास ना आया
बहुत उम्मीद लगाई थी इस सफ़र से, चलता रहा पर परवाज़ ना आया
मुझे घर से निकलना रास ना आया
याद भरी आंखें आंसुं बहाए, सिसकियां ली पर सांस ना आया
मुझे घर से निकलना रास ना आया
लोगों का जीवन खुदगर्ज़ी से भरा है, बहुत कोशिश की पर यह अंदाज़ ना आया
मुझे घर से निकलना रास ना आया
दो पल खुल के जीना चाहता था, आज़ादी मिली पर उलास ना आया
मुझे घर से निकलना रास ना आया
पर हारना मेरी और ज़िन्दगी की पहचान नहीं, कोन नहीं जिसके जीवन में बनवास ना आया
मुझे घर से निकलना रास ना आया
ज़ख्म खाए है पर होंसला बुलंद है, विशाल ऐसा बना की लोगों को विश्वास ना आया
मुझे घर से निकलना रास ना आया

