हक़ की बातें करने वालों पर, कैसी आफ़त ढाई है? कलम पकड़ने वाले हाथों पर, लाठी क्यों बरसाई है? पूछ रही हैं दिल्ली की सड़कें, सत्ता के गलियारों से, कब तक बचा के रखोगे, पेपर लीक के जिम्मेदारों को? कितना मारोगे लाचारो को, शोषित और बेचारों को… किताबों के पन्नों पर तुमने, गहरा दर्द बिछाया है, हक़ माँगने जो निकले थे, उन पर ही बल बरसाया है। वोट माँगने जब निकलोगे, बोलो क्या मुँह दिखलाओगे? छल से कब तक दबा सकोगे, जनता के अधिकारों को? कितना मारोगे लाचारो को, शोषित और बेचारों को… दबाओ मत इन आवाज़ों को, वरना ऐसी क्रांति लाएंगी, जहाँ तलक गूँजेगी यह, सत्ता की कुर्सियाँ ढह जाएँगी! इंकलाब की यह आवाज़ें, अब ना झुकने पाएँगी, कब तक रोकोगे तुम बोलो, भविष्य के इन कर्णधारों को? कितना मारोगे लाचारों को, शोषित और बेचारों को…

