दारू

गमो की लहर दारू तोड़ सकती है
टूटे दिलो के तार दारू जोड़ सकती है

दरिया को हाथो से ही मोड़ सकती है
दुश्मनो के इरादों को यह झंझोड़ सकती है

टूटे हुए रिश्तों को भी यह जोड़ सकती है
आते हुए तूफानों का रुख मोड़ सकती है

मन की आंखो को यह खोल सकती है
ध्यान से सुनो बोतल बोल सकती है

क्या नही कर सकती दारू
कोई पूछे
तो कहूं
इंसान में इंसानियत डाल सकती है
हया, डर, भरम निकाल सकती है

और जो पूछो
तो बताऊं मैं तुम्हें
की कैसे इंसान को फरिश्ता बना सकती है
मज़बूत हर रिश्ता यह बना सकती है

हरी हिलता क्यों नहीं

ॐ से बनी यह दुनिया, बोम्ब तक पहुंच गई
फिर भी हरी हिलता क्यों नहीं

लोग दर्द में करहा रहे है
बेगुनाह मर रहे है, और तमाशाही तालियां बजा रहे है
खून की नदियां, बह बह कर सुख गई
अब लाल हुई इस इस मिट्टी में, कोई फूल खिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

ताकतवर, कमज़ोर को दबा रहे है
इंसानियत बिक रही है, और हैवान बोलियां लगा रहे है
कहने को तो बहुत कुछ है इस जहान में
पर पेट भर खाना, गरीब के बच्चे को मिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

कहीं सुकून नहीं, चारो तरफ ही शोर है
कोई यहां पाक नहीं, हर दिल में छुपा चोर है
विचारों की ऐसी गुरबत क्यों है यहाँ
की अब गीता ज्ञान से भी, गिरता यह मन संभालता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं।