जिंदगी समझ में कहां आती है?
कहां पूरी होती है वोह ख्वाहिशें
जो चाहत–ए–रूह हो जाती है
जिंदगी…
रोज़मराह की मुश्किलों को आसान करने में
टुकड़ा टुकड़ा कर के सारी उम्र गुज़र जाती है
जिंदगी…
जैसे दिन ढल जाता है, कुछ देर रहकर
वैसे ही यह जिंदगानी ढल जाती है
जिंदगी…
समय की रेत में, सब मिटता चला जा रहा
कहां मेरी कोई खींची लकीर, बनी रह पाती है
जिंदगी…
और फिर कहते है
की जिंदगी का मिलना बहुत बड़ी इनायत है
मान लिया, मुझे कहां इस बात से कोई शिकायत है
पर क़त्ल-ओ-ग़ारत के इस माहौल में
कितनो को कोई मदद-गारी मिल पाती है
जिंदगी…
शायद कोई मतलब, कोई जवाब, है ही नही
कितने बने, कितने मरे, कोई हिसाब है ही नही
बस समय की लहर है, जो की बहती चली जाती है
जिंदगी समझ में कहां आती है?
Author: Vishal Gupta
दारू
गमो की लहर दारू तोड़ सकती है
टूटे दिलो के तार दारू जोड़ सकती है
दरिया को हाथो से ही मोड़ सकती है
दुश्मनो के इरादों को यह झंझोड़ सकती है
टूटे हुए रिश्तों को भी यह जोड़ सकती है
आते हुए तूफानों का रुख मोड़ सकती है
मन की आंखो को यह खोल सकती है
ध्यान से सुनो बोतल बोल सकती है
क्या नही कर सकती दारू
कोई पूछे
तो कहूं
इंसान में इंसानियत डाल सकती है
हया, डर, भरम निकाल सकती है
और जो पूछो
तो बताऊं मैं तुम्हें
की कैसे इंसान को फरिश्ता बना सकती है
मज़बूत हर रिश्ता यह बना सकती है

