वो तजुर्बा है

थोड़े शब्दो में गहरी बात कह जाना, वो तजुर्बा है

गुस्सा बहुत हो पर चुप रह जाना, वो तजुर्बा है

भूख जितनी हो उससे थोड़ा कम ही खाना, वो तजुर्बा है

अपने हिस्से की रोटी किसी भूखे को खिलाना, वो तजुर्बा है

मां बाबा के कहे बिना उनके पांव दबाना, वो तजुर्बा है

घर जाते समय बच्चों के लिए कुछ ले जाना, वो तजुर्बा है

घर के सूरत–ए–हाल दुनिया को ना दिखालाना, वो तजुर्बा है

बाहर की उलझनों को घर पर ना ले आना, वो तजुर्बा है

अपना समय अच्छे लोगों की संगत में लगाना, वो तजुर्बा है

ज़िंदगी को कोशिशों से कल से बेहतर बनाना, वो तजुर्बा है

चकाचौंध की जिंदगी से ख़ुद को बचाते चले जाना, वो तजुर्बा है

किसी की मदद करते समय उसको ना जतलाना, वो तजुर्बा है

ख़ुद को याद दिलाते रहना की पता नहीं हमें कब चले जाना, वो तजुर्बा है

आखिरी घड़ियों में रब का शुक्रिया करना और मुस्कुराना, वो तजुर्बा है

जिंदगी

जिंदगी समझ में कहां आती है?

कहां पूरी होती है वोह ख्वाहिशें
जो चाहत–ए–रूह हो जाती है
जिंदगी…

रोज़मराह की मुश्किलों को आसान करने में
टुकड़ा टुकड़ा कर के सारी उम्र गुज़र जाती है
जिंदगी…

जैसे दिन ढल जाता है, कुछ देर रहकर
वैसे ही यह जिंदगानी ढल जाती है
जिंदगी…

समय की रेत में, सब मिटता चला जा रहा
कहां मेरी कोई खींची लकीर, बनी रह पाती है
जिंदगी…

और फिर कहते है
की जिंदगी का मिलना बहुत बड़ी इनायत है
मान लिया, मुझे कहां इस बात से कोई शिकायत है

पर क़त्ल-ओ-ग़ारत के इस माहौल में
कितनो को कोई मदद-गारी मिल पाती है
जिंदगी…

शायद कोई मतलब, कोई जवाब, है ही नही
कितने बने, कितने मरे, कोई हिसाब है ही नही
बस नदी की लहर है, जो की बहती चली जाती है

जिंदगी समझ में कहां आती है?