ज़िन्दगी समझ जाएगी

ज़िन्दगी तो कोरा कागज़ है
कुछ भी लिख दो, यह तो समझ जाएगी

मान लेगी उसे अपनी किस्मत
और उसे सुधारने में लग जाएगी

राही तु डगर पर पांव तो रख
मंजिल ख़ुद-बा-ख़ुद तुझे नज़र आएगी

यूहीं लंबी लगती है डगर तुझको
कुछ घड़ियों में ही यह गुज़र जाएगी

गर कभी थोड़ी खुशियां, ज़्यादा गम हो
तो देख लेना उनके, जिनसे तुम्हारे कम हो
उन के देखते ही, ख़ुद के यह भूल जाएगी

ज़िन्दगी ना रुकती है, ना तुम रुकना
गर लगा के तुम हारे, फिर भी ना झुकना
चलते चलते यह ख़ुद ही संभल जाएगी

गर समझ कर जिये, जैसे जीना है
तो हर दिन उजियारा और रात पूर्णिमा है
फिर तो मौत भी पूछ कर आएगी

ज़िन्दगी तो कोरा कागज़ है
कुछ भी लिख दो, यह तो समझ जाएगी।

मेरी मां

मेरी सजावत से क्या
मेरी सजावत भी तुम हो
मेरी इबादत भी तुम हो

तुम ही हो जन्नत के नज़ारे
तुम ही हो दिल जिसे पुकारे

तुम ही हो वोह न्यारी मूरत
तुम ही हो सबसे ख़ूबसूरत

करुणा, दया, प्यार और ममता तुम से झलकती है
तुम्हे याद करते हुए, पलक तक ना झपकती है

तुम उन ऋषियों की तपस्या हो, जो प्रभु को पाना चाहते है
तुम समंदर का वोह क्षितिज हो, जिसमें सूरज डूब जाना चाहते है

तुम वोह हो जिसमें मेरा मन, हर पल ही पल सुख पाता है
तुम हो मेरी मां, जिसे देखकर मेरा दिल मुस्कुराता है।