उड़ने की तमन्ना

उड़ने की तमन्ना और संभल कर चलना
यह एक ही सिक्के के दो हिस्से है

नहीं तो जनाब, खोलो किताब
उन जैसे लोगों के भरे पड़े किस्से है

की वोह लोग ऐसे गिरे
की गिरने की आवाज़ तक ना हुई

राख हुई उनकी उम्मीदें
और सपने जल गए जैसे हो रूई

दोनों ही पंख ग़र सबल हों
तब ही उड़ान भर सकते हो

हवा को शर्मिंदा
और क्षितिज का दीदार कर सकते हो

ग़र समझ गए तो खोलो दोनों पंख
और उड़ान भरो

छा जाओ पूरी कायनात पर
और अपनी मुठ्ठी में आसमान करो।

13.02.2013

जिंदगी

जिंदगी समझ में कहां आती है?

कहां पूरी होती है वोह ख्वाहिशें
जो चाहत–ए–रूह हो जाती है
जिंदगी…

रोज़मराह की मुश्किलों को आसान करने में
टुकड़ा टुकड़ा कर के सारी उम्र गुज़र जाती है
जिंदगी…

जैसे दिन ढल जाता है, कुछ देर रहकर
वैसे ही यह जिंदगानी ढल जाती है
जिंदगी…

समय की रेत में, सब मिटता चला जा रहा
कहां मेरी कोई खींची लकीर, बनी रह पाती है
जिंदगी…

और फिर कहते है
की जिंदगी का मिलना बहुत बड़ी इनायत है
मान लिया, मुझे कहां इस बात से कोई शिकायत है

पर क़त्ल-ओ-ग़ारत के इस माहौल में
कितनो को कोई मदद-गारी मिल पाती है
जिंदगी…

शायद कोई मतलब, कोई जवाब, है ही नही
कितने बने, कितने मरे, कोई हिसाब है ही नही
बस समय की लहर है, जो की बहती चली जाती है

जिंदगी समझ में कहां आती है?