एक हम ही हुए बेघर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है
अनजान शहर में प्यारे, एक हम ही हुए बेघर है

सब को बताया, सब ज़ोर लगाया
पर हुआ ना कुछ, सब बेअसर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है

आज दिन हुए है आठ, मुझे लग रहे है साठ
चौंसठ के चोकड़े में, बस कुछ इधर उधर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है

अब कहां हम है जाए, हर जगह बड़ गए है किराए
शेयरिंग करने में भी लोग दिखाते है नखरे, और करते अगर मगर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है

नोबत है अब यह आई, मंदिर में रात बिताई
समझाते मन अपने को, की मीठा फल सबर है

क्या बताएं तुमको, की हम जीते किस क़दर है।

क्या है ज़िन्दगी – 3

दुख में पनपती, छटपटाती ज़िन्दगी
तरसती और मुरझाती ज़िन्दगी

उम्मीदों के तानों को बुनती ज़िन्दगी
घड़ी की टीक टीक को सुनती ज़िन्दगी

पेट की तपिश में बार बार झुलसती ज़िन्दगी
दो टुकड़ों के लिए बिक जाती, हो जाती इतनी सस्ती ज़िन्दगी

छोटी डगर को लम्बा समझती ज़िन्दगी
डगर के लम्बे सफ़र से सहमती ज़िन्दगी

सफ़र में राहगीरों की तलाश करती ज़िन्दगी
फिर एक एक करके सबको दरकिनार करती ज़िन्दगी

बेमतलबी, बेवजह, बदगुमान ज़िन्दगी
तड़पती, बिलखती, मौत पे सवार ज़िन्दगी

मत पूछो वजह क्या है मेरे यार ज़िन्दगी
बताने से इसने किया है इंकार ज़िन्दगी।