बीता समय, अच्छा था या बुरा, कुछ याद नहीं । क्या वोह लम्हे बरकत के थे या हरज़े के, कुछ याद नहीं ।। याद है तो बस इतना, की जिंदगी थी और हम जिंदा थे । क्यों और कैसे, उतना सब तो अब याद नहीं ।। याद करके करना भी क्या है ओ शायर, समय तो बह कर गुज़र गया । आज खड़ा है सामने हाथ बढ़ाए, की चलो कुछ नई यादें बनाएं ।। अब कोशिश हो की ऐसे जिए, की लम्हा-दर-लम्हा याद रहे । सजाए कुछ ऐसा यादों के आशियाने को, की हमारे जाने के बाद भी वोह आबाद रहे ।।
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आगे क्या करना है
आगे क्या करना है, आगे क्या होना है
कुछ पता नही
पता है तो बस इतना, की जीना है
क्यों और कैसे, अभी उसकी भी कोई ख़बर नहीं
मरना जब विकल्प ही नहीं है
तब तो जीना ही होगा
क्या करू ऐसा की जिंदगी सार्थक लगे
सिर्फ़ खाना कमाना तो इसका अर्थ नहीं हो सकता
कहां ढूंढू मैं इसका मतलब, किससे पूछ के आऊ
चलूं पुराने रास्तों पर या कोई नई डगर बनाऊं
किससे पूछ के आऊ

