मन का ख़ौफ

मन मुझे ख़ौफ दिखता है
आने वाले कल की मुश्किलें बताता है

कहता है कि जब सब जी रहे है इसी तरह
तो क्या सच मुच सही है मेरा दूसरी राह खोजना

कहीं भटक ना जाना, कहीं भटक ना जाना
यह कह कह कर भटकाता है

हूं शुभ चिंतक मैं तुम्हारा
यह कह कर भरमाता है

पर मुझे इस चपल मन की चतुराई का ख़ूब अंदाज़ा है
क्यूंकि इसकी बातों में आकर, खाई ठोकरों के जख्म अभी ताज़ा है

बहुत बार इसकी बातों मैं आ चुका हूं मैं
इसके पीछे चल के ख़ूब ठोकरें खा चुका हूं मैं

अब प्रकाश की इक किरण पकड़ कर
सूरज की तलाश में चलूंगा मैं

खोज अब उसकी ही होगी
चाहे पास जाने पे जलुंगा मैं ।

चंद लम्हों की उम्मीद

चंद लम्हों की उम्मीद है मुझको
बाकी सब थोड़ा है

ज़माना पूछ रहा है मुझसे
की मैंने क्यों सब छोड़ा है

अपना ठिकाना है हवां सा
मगन गगन में घुमु

फूलों की पंखुड़ियां छेड़ू
और तितलियों के परों को चुमु

इतना दुख देखा है मैंने
की अब दुख भी मुझसे भागे

अब इत्मीनान से चलता हूं मैं
नहीं परवाह क्या है आगे

बस अब इक ही चाहना है बाकी
इक ही बाकी तमन्ना

की ज़िन्दगी तो फूलों से हो गई
पर मौत से कैसे संभालना

अभी मेरा मरना है बाकी
और जैसे दीयो की बाती, सब जलती है बुझने को

कितना भी लंबा सफर ही साकी
सब चलते है रुकने को

चलना ही ज़िन्दगी की है आदत
चलना ही है जीना

मौत गर कहीं दिख भी जाए
सामने कर देना अपना सीना

मस्ती में चलना और हर पल खिलना
अब आदत है मेरी

बैठा हूं त्यार मैं अब तो
मौत की तरफ से है देरी ।

25.12.2012