मैं जानता हूं

मझधार में फंसा हूं मैं, मैं जानता हूं
अपनी गलतियों की वजह से यहां हूं मैं, मैं जानता हूं

जमाने भर से लड़ा हूं मैं, मैं जानता हूं
कोरे अहम से भरा हूं मैं, मैं जानता हूं

औरों के गम में मुस्कुराया हूं मैं, मैं जानता हूं
ज़ुल्म करने में ना हिचकिचाया हूं में, मैं जानता हूं

ईर्षा में पागल होकर छटपटाया हूं मैं, मैं जानता हूं
खुशी किसी कि भी ना देख पाया हूं मैं, मैं जानता हूं

काश के कोई समझा देता मुझे
जो असल बात है वोह बता देता मुझे

तो आज इतना पछतावा ना होता
रुंधे रुंधे गले से मैं इतना ना रोता

अब कोई मेरी कब्र पर फूल चढ़ाने नहीं आता
मेरे जिंदा ना होने का मातम नहीं मनाता

अब तो दोजक की आग जलाए मुझे
कब से जागा हूं, सुलाए मुझे

सब झूठ था, अब मानता हूं मैं
अब असल मैं कुछ जानता हूं मैं।

मेरी मां

मेरी सजावत से क्या
मेरी सजावत भी तुम हो
मेरी इबादत भी तुम हो

तुम ही हो जन्नत के नज़ारे
तुम ही हो दिल जिसे पुकारे

तुम ही हो वोह न्यारी मूरत
तुम ही हो सबसे ख़ूबसूरत

करुणा, दया, प्यार और ममता तुम से झलकती है
तुम्हे याद करते हुए, पलक तक ना झपकती है

तुम उन ऋषियों की तपस्या हो, जो प्रभु को पाना चाहते है
तुम समंदर का वोह क्षितिज हो, जिसमें सूरज डूब जाना चाहते है

तुम वोह हो जिसमें मेरा मन, हर पल ही पल सुख पाता है
तुम हो मेरी मां, जिसे देखकर मेरा दिल मुस्कुराता है।