कुछ आंसू बहा कर

कुछ आंसू बहा कर, तुम सचे बन गए
अब रो लिए है हम, यह कह कर तन गए

पर तुम्हे अपनी गलती का तो एहसास नहीं
कहां बेच आए हो, जो इतनी सी शर्म भी तुम्हारे पास नहीं

और फिर कहते हो की सब नोर्मल करदो
अब कभी ना सुनाना इस भूल का किस्सा, इसे दफ़न करदो

पर तुम्हे ना कोई एहसास है, और ना ही कोई बदलाव है
कल भी यही करोगे, बस कब? यही सवाल है

तुम कितने स्वार्थ से भर गए हो, की तुम्हे अपनो का दुख दिखता नहीं
यह तो खून के रिश्तों की पकड़ है, वरना इस तूफ़ान में कोई टिकता नहीं

ना करो मिट्टी वोह साल, वोह दिन जो सिंचन में लगाएं है
मत छोड़ो इस कश्ती को, किनारे से बहुत दूर हम आएं है

कहना हमारा फ़र्ज़ है, पर करना तुम्हारी चाह है
फूल बिछा रहे थे हम क़दमों में, क्यूंकि कांटो भरी यह राह है

समझ करो ऐ प्यारे, अपनी भूल सुधारो
अपने नहीं मिलेंगे कहीं, चाहे लोग इकठ्ठे करलो हज़ारों।

आदमी की नस्ल

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

आबरू है बिक रही
बोली लगा रहा है आदमी

गमों नशो में लुट गया
बिखर गया है आदमी

किस शक्ल को देखूं मैं
किस नाज़ से बयां करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

शिकन की बस्ती बस्तियां
लहू हजुम की आंखों में

तल्खियां ही तल्खियां
यहां है सब की बातों में

उम्मीद-ए-चिराग़ बुझ रहे
किस तेल से जवां करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

शौंक दौलत-ए-जहान में
लहू की नदिया बही

कहीं खुद को बचाना था इसे
और ख़ुदा बचाना था कहीं

ख़त्म हो हैवानियत इंसान की
ना जाने क्या दवाँ करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

मंदिर के बाहर रो रहा
पुकारता है आदमी

गर मिले तो खुश है सभी
नहीं तो धितकारता है आदमी

इबादत नहीं यह लूट है
पर मुर्दो से क्या गिला करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

जलाद बन के काटता
टुकड़ों को बुनता आदमी

क्रोध में जब बह चला
कुछ ना है सुनता आदमी

कैसे मैं समझाऊं इसे
किस लेहज़े में कहा करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू