झटका

इस बार का झटका बहुत भारी पड़ा
झटके पहले भी लगे बहुत,
पर इस बार का झटके ने बहुत कमज़ोर किया

कुछ उम्र का तक़ाज़ा भी था,
और कुछ पहले लगे झटको की सनसनाहट बाकी थी अभी

फिर भी मुस्कुराकर जीने का फैंसला किया था मैंने,
सोचा, की जितना वक्त मिला है चलो उतना ही सही

मेहर उस रब की जिसने इस बार भी बचा लिया,
सब झंझटों परिशानियो को कुछ दिनों मैं ही सुलझा दिया

अब समझ में यह नहीं आ रहा की आगे क्या करामात करू,
जिंदगी के बिखरे टुकड़े समेटु या नए सिरे से शुरुआत करू

आगे क्या करामात करू।।

कितना सहे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

क्या कटु बोलना प्रेमी का अधिकार है
फिर क्यूं उसके शब्द मुझे लगे तिरस्कार है
मोहब्बत की इस कड़ी को हम क्यों ना समझ सके

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

क्या कटु सुनने में छुपा हमारा भला है
फिर क्यों उन शब्दों से कलेजा मेरा जला है
जलने का डर मुझे कर रहा तुम से परे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

फूलों के संग भी लगे हज़ारों कांटे है
क्या यही सोचकर तुमने अपने शब्द छांटे है
मेरे मन उन नोकीले कांटो से बहुत है डरे

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

कैसे समझाए मन को की कटु बोलना तुम्हारी आदत है
उन शब्दों में भी छुपी मेरे लिए तुम्हारी इबादत है
मन की इस उलझन को कैसे दूर करें

किसकी सहे, किसकी ना सहे
किससे कहें, किससे ना कहें

30.03.2009