बात बेमतलबी है

कोई गोल गोल घेरे में चक्कर लगाता है
तो बात बेमतलबी है

और कोई सुख के ख़ोज में दुख की और जाता है
तो बात बेमतलबी है

पर इस बेमतलबी दुनिया में मतलब कहां से लाऊं
भटके है सब लोग यहां, मैं किसे किसे समझाऊं।

05.01.2013

अपने आप में आयो तुम


चलो दुख मनाना बंद करो, और अपने आप में आयो तुम
यह ज़िन्दगी है दुख मई, समझो संभल जाओ रे तुम

यह ज़िन्दगी कुछ भी नहीं, कुछ लम्हों की खेरात है
अपना पराया क्या यहां, कुछ भी ना जाना साथ है

हर सांस में इक आस है, कितना तुम्हे भटकाएगी
मन की दबी सी आवाज़ है, वोह क्या तुम्हे समझाएगी

सबल करो इस मन को तुम, तृष्णा को पहले त्याग दो
भीतर के उठते वेग को, प्रज्ञा से तुम निकाल दो

बहादो वोह सब कल्पना, जीवन में जिससे भार है
समता में खुद को स्थिर करो, समता ही जीवन सार है।

30/05/2014