अपनों कि लगाई आग

जो आग मुझे दिख रही है
क्या उसकी तपिश का तुम्हे अहसास नहीं

पूरे घर को जलाकर राख कर देगी यह
तुम्हे इसकी ताक़त का अंदाज़ नहीं

माना कि यह अपनों कि लगाई आग है
पर फिर भी जलाएगी तुम्हे

इस आग की लपटे
आम आग से सो गुना ज्यादा तड़पाएगी तुम्हे

जो आग बुझा सकते थे
उनके मन सोए हुए है

उनसे कुछ उमीद ना करना
वोह ख़ुद बेबस होए हुए है

बचाने के लिए
कुछ भी साधन किसी के पास नहीं

मेरी मानो तो निकलो यहां से
इस धुएं में ले सके ऐसा एक भी सांस नहीं।

दगाबाज़ी

तुम्हें तो शायद लोगों ने
मगर हमें तो उस ख़ुदा ने ठगा है
चोरों से बचना तो आसान है मगर
उससे बच सके ऐसी कौन जगह है

बड़े आराम से हमतो
जीवन की नींद में मस्त थे
अपने लिए ही जीते थे हमतो
चाहे औरों के लिए मतलब परस्त थे

इक दिन इसी आराम के माहौल से हमें
पकड़ कर ले गए इसके सिपाही
ना था कोई वकील, ना था कोई गवाह
और ना ही हुई कोई सुनवाही

कह दिया कि तुम मुज़रिम हो
और यह है सजा़ तुम्हारी
यह कैसा इंसाफ है इनका
किसी ने बात भी नहीं सुनी हमारी