हरी हिलता क्यों नहीं

ॐ से बनी यह दुनिया, बोम्ब तक पहुंच गई
फिर भी हरी हिलता क्यों नहीं

लोग दर्द में करहा रहे है
बेगुनाह मर रहे है, और तमाशाही तालियां बजा रहे है
खून की नदियां, बह बह कर सुख गई
अब लाल हुई इस इस मिट्टी में, कोई फूल खिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

ताकतवर, कमज़ोर को दबा रहे है
इंसानियत बिक रही है, और हैवान बोलियां लगा रहे है
कहने को तो बहुत कुछ है इस जहान में
पर पेट भर खाना, गरीब के बच्चे को मिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

कहीं सुकून नहीं, चारो तरफ ही शोर है
कोई यहां पाक नहीं, हर दिल में छुपा चोर है
विचारों की ऐसी गुरबत क्यों है यहाँ
की अब गीता ज्ञान से भी, गिरता यह मन संभालता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं।

क्यों बेड़ियां मेरे पावों में है

क्यों बेड़ियां मेरे पावों में है
क्यों सिसकियां इन हवाओं में है

क्यों होंसला कमजोर है
क्यों पकड़ा एक ही छोर है

क्यों उड़ने से मैं डर रहा
क्यों ना कोशिश मैं कर रहा

क्या मन में चल रहा कुछ और है
क्या इसीलए इतना शोर है

क्या मन में मेरे चोर है
क्या इसने ही किया कमजोर है

कैसे लडू ख़ुद ही से मैं
जब मन ही मेरा चोर है|