मन की पर्ते

मन की पर्ते खोली तो उनमें दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध थी
कहीं राग की, कहीं द्वेष की, कहीं काम की, कहीं क्लेश की

भाग उठा मन वहां से, कहता कि अब और नहीं
यह कैसी लत लगी है मुझे, जिसकी तलब पे मेरा कोई ज़ोर नहीं

लाचार हूं, कि कोई बचा दे मुझे
परेशान हूं, की कोई हटा दे मुझे

पर भिखारियों की इस दुनिया में दाताकार कोई और नहीं
सब फंसे है इस दलदल में और मददगार कोई और नहीं

आंसूओं से समुद्र भर दिया, पर तारणहार कोई और नहीं
चाहे गलती की है मैंने अनजाने में, पर बख्शनहार कोई और नहीं

जब सब करने वाला मन है मेरा, तब करावनहार कोई और नहीं
खुद ही खुद को समझ ले प्यारे, समझावनहार यहां कोई और नहीं।

5.01.2013

जिंदगी

जिंदगी समझ में कहां आती है?

कहां पूरी होती है वोह ख्वाहिशें
जो चाहत–ए–रूह हो जाती है
जिंदगी…

रोज़मराह की मुश्किलों को आसान करने में
टुकड़ा टुकड़ा कर के सारी उम्र गुज़र जाती है
जिंदगी…

जैसे दिन ढल जाता है, कुछ देर रहकर
वैसे ही यह जिंदगानी ढल जाती है
जिंदगी…

समय की रेत में, सब मिटता चला जा रहा
कहां मेरी कोई खींची लकीर, बनी रह पाती है
जिंदगी…

और फिर कहते है
की जिंदगी का मिलना बहुत बड़ी इनायत है
मान लिया, मुझे कहां इस बात से कोई शिकायत है

पर क़त्ल-ओ-ग़ारत के इस माहौल में
कितनो को कोई मदद-गारी मिल पाती है
जिंदगी…

शायद कोई मतलब, कोई जवाब, है ही नही
कितने बने, कितने मरे, कोई हिसाब है ही नही
बस समय की लहर है, जो की बहती चली जाती है

जिंदगी समझ में कहां आती है?