मैं जानता हूं

मझधार में फंसा हूं मैं, मैं जानता हूं
अपनी गलतियों की वजह से यहां हूं मैं, मैं जानता हूं

जमाने भर से लड़ा हूं मैं, मैं जानता हूं
कोरे अहम से भरा हूं मैं, मैं जानता हूं

औरों के गम में मुस्कुराया हूं मैं, मैं जानता हूं
ज़ुल्म करने में ना हिचकिचाया हूं में, मैं जानता हूं

ईर्षा में पागल होकर छटपटाया हूं मैं, मैं जानता हूं
खुशी किसी कि भी ना देख पाया हूं मैं, मैं जानता हूं

काश के कोई समझा देता मुझे
जो असल बात है वोह बता देता मुझे

तो आज इतना पछतावा ना होता
रुंधे रुंधे गले से मैं इतना ना रोता

अब कोई मेरी कब्र पर फूल चढ़ाने नहीं आता
मेरे जिंदा ना होने का मातम नहीं मनाता

अब तो दोजक की आग जलाए मुझे
कब से जागा हूं, सुलाए मुझे

सब झूठ था, अब मानता हूं मैं
अब असल मैं कुछ जानता हूं मैं।

गुज़ारिश

जिंदगी सार्थक कर दे ए मौला,
मुझे सलीके से जीने का मौका दे।


नई तय कर मेरे जीवन की ऊंचाइयां,
जिंदगी में नई तमनाओ का झोंका दे।


बारीशे कर इल्म-ओ-हुनर की मुझ पर,
मुझे नई बुलंदियों पर पहुंचा दे।


मैं ऊपर उठू तेरे रहम-ओ-करम से मेरे मौला,
मेरे जीवन को जन्नत बना दे।


हटा मेरे सर से बोझ सभी फिकरों का,
मुझे सकून से जीना का सलीका दे।


और मिटा दे मेरे जेहन से, जो भी बुरा सीखा है मैंने,
मुझे प्यार के, इबादत के, दो लफ्ज़ सीखा दे।


मैं खोजू तुझ को और तुझी से ही मिल जायूँ,
यही मेरी जिंदगी की मंजिल तू बना दे।


इमदाद कर तू यही मेरे मौला,
मैं मिल सकूं तुझ से, मुझे इतना काबिल तू बना दे।


मुझे तुझसे(खुदसे) मिलने का मौका दे।।