छुआछूत

कया मेरी ही गलती है ओह शायर
के समाज का ही कसूर है
जब ख़ुद बनाते है अपने इस्तेमाल के लिए
तो मेरे होने को ही गलत बताना, यह कैसा दस्तूर है

मुझसे घिन आती है सबको अब
जबकि आंसूओं में नहाया हूं मैं
तो क्यूं मुझे दोजक की आग दिखाते हो
क्या उस अल्लाह का नहीं बनाया हूं मैं

मेरे ऐसा होना या वैसा होना
उस मालिक की मर्ज़ी है
हम सब बिखरी कतरन है
वोह सीने वाला दर्जी़ है

तो अब वास्ता है उस मालिक का
मुझे इस छोटी सी ज़िन्दगी को पूरा करने दो
सिर उठाकर जीने तो ना दोगे शायद
पर मुझे बाइज्जत सकून से मारने दो

अपनी छोटी सी ज़िन्दगी पूरी करने दो

03.05.2013

ऐ दोस्त

तुम दोस्त हो कर, मेरी किसी बात पर मुस्कुराते नहीं।
मैं आवाज़ लगाता रह जाता हूं, पर तुम लोट कर आते नहीं।।

यह कैसी दोस्ती है, जिसमें तुम मेरे साथ वक्त बिताते नहीं।
कहां हो, कैसे हो, क्या कर रहें हो, पूछो तो कुछ बताते नहीं।।

कभी कभी तो यूं लगता है, की अब वोह पुरानी वाली बात रही नहीं।
पहले घंटों होती थी एक के बढ़कर एक फिजूल की बातें, अब कहते हो की करने को कोई बात नहीं।।

क्या करते रहते हो आज कल, क्या है जिसमे इतना खो गए हो तुम।
लगता है जैसे जिंदगी की परेशानियों से, कुछ ज्यादा ही मायुस हो गए हो तुम।।

बाहर आयो इस उलझावे से, देखो मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।
मिल जाए मुझे वही पुराना दोस्त, दुआ यह बार बार कर रहा हूं।।

मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।