क्या है ज़िन्दगी – 3

दुख में पनपती, छटपटाती ज़िन्दगी
तरसती और मुरझाती ज़िन्दगी

उम्मीदों के तानों को बुनती ज़िन्दगी
घड़ी की टीक टीक को सुनती ज़िन्दगी

पेट की तपिश में बार बार झुलसती ज़िन्दगी
दो टुकड़ों के लिए बिक जाती, हो जाती इतनी सस्ती ज़िन्दगी

छोटी डगर को लम्बा समझती ज़िन्दगी
डगर के लम्बे सफ़र से सहमती ज़िन्दगी

सफ़र में राहगीरों की तलाश करती ज़िन्दगी
फिर एक एक करके सबको दरकिनार करती ज़िन्दगी

बेमतलबी, बेवजह, बदगुमान ज़िन्दगी
तड़पती, बिलखती, मौत पे सवार ज़िन्दगी

मत पूछो वजह क्या है मेरे यार ज़िन्दगी
बताने से इसने किया है इंकार ज़िन्दगी।

दुनिया ने हमें सब सिखाया

दुनिया ने हमें सब सिखाया, पर मरना नहीं
ज़िन्दगी लंबी लगती है मगर, इसका ऐतबार करना नहीं

चंद लम्हों में ही सिमट कर खो जाती है
सांसों की लड़ी देखते ही देखते बंद हो जाती है

मरना तो किसी की ख्वाहिश नहीं है, फिर क्यूं मौत आती है
ज़िन्दगी आंखें नम कर लेती है, पर मौत को ना रोक पाती है

रह रह कर मन मेरा मुझसे पूछता है, की क्या मुझे भी मरना होगा
मैं भी जलूंगा कभी, क्या लकड़ियों का इंतज़ाम करना होगा

मुझे समझ नहीं आता कि अपने मन से क्या कहूं
शायद मैं और मेरा मन हम दोनों ही सच जानते है, पर इसे अनदेखा कैसे करू।