आगे क्या करना है, आगे क्या होना है
कुछ पता नही
पता है तो बस इतना, की जीना है
क्यों और कैसे, अभी उसकी भी कोई ख़बर नहीं
मरना जब विकल्प ही नहीं है
तब तो जीना ही होगा
क्या करू ऐसा की जिंदगी सार्थक लगे
सिर्फ़ खाना कमाना तो इसका अर्थ नहीं हो सकता
कहां ढूंढू मैं इसका मतलब, किससे पूछ के आऊ
चलूं पुराने रास्तों पर या कोई नई डगर बनाऊं
किससे पूछ के आऊ
Category: Poems
छुआछूत
कया मेरी ही गलती है ओह शायर
के समाज का ही कसूर है
जब ख़ुद बनाते है अपने इस्तेमाल के लिए
तो मेरे होने को ही गलत बताना, यह कैसा दस्तूर है
के समाज का ही कसूर है
जब ख़ुद बनाते है अपने इस्तेमाल के लिए
तो मेरे होने को ही गलत बताना, यह कैसा दस्तूर है
मुझसे घिन आती है सबको अब
जबकि आंसूओं में नहाया हूं मैं
तो क्यूं मुझे दोजक की आग दिखाते हो
क्या उस अल्लाह का नहीं बनाया हूं मैं
मेरे ऐसा होना या वैसा होना
उस मालिक की मर्ज़ी है
हम सब बिखरी कतरन है
वोह सीने वाला दर्जी़ है
तो अब वास्ता है उस मालिक का
मुझे इस छोटी सी ज़िन्दगी को पूरा करने दो
सिर उठाकर जीने तो ना दोगे शायद
पर मुझे बाइज्जत सकून से मारने दो
अपनी छोटी सी ज़िन्दगी पूरी करने दो
03.05.2013

