हक़ की बातें करने वालों पर, कैसी आफ़त ढाई है? कलम पकड़ने वाले हाथों पर, लाठी क्यों बरसाई है? पूछ रही हैं दिल्ली की सड़कें, सत्ता के गलियारों से, कब तक बचा के रखोगे, पेपर लीक के जिम्मेदारों को? कितना मारोगे लाचारो को, शोषित और बेचारों को… किताबों के पन्नों पर तुमने, गहरा दर्द बिछाया है, हक़ माँगने जो निकले थे, उन पर ही बल बरसाया है। वोट माँगने जब निकलोगे, बोलो क्या मुँह दिखलाओगे? छल से कब तक दबा सकोगे, जनता के अधिकारों को? कितना मारोगे लाचारो को, शोषित और बेचारों को… दबाओ मत इन आवाज़ों को, वरना ऐसी क्रांति लाएंगी, जहाँ तलक गूँजेगी यह, सत्ता की कुर्सियाँ ढह जाएँगी! इंकलाब की यह आवाज़ें, अब ना झुकने पाएँगी, कब तक रोकोगे तुम बोलो, भविष्य के इन कर्णधारों को? कितना मारोगे लाचारों को, शोषित और बेचारों को…
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वो तजुर्बा है
थोड़े शब्दो में गहरी बात कह जाना, वो तजुर्बा है
गुस्सा बहुत हो पर चुप रह जाना, वो तजुर्बा है
भूख जितनी हो उससे थोड़ा कम ही खाना, वो तजुर्बा है
अपनी रोटी का एक हिस्सा किसी भूखे को खिलाना, वो तजुर्बा है
मां बाबा के कहे बिना उनके पांव दबाना, वो तजुर्बा है
घर जाते समय बच्चों के लिए कुछ ले जाना, वो तजुर्बा है
घर के सूरत–ए–हाल दुनिया को ना दिखालाना, वो तजुर्बा है
बाहर की उलझनों को घर पर ना ले आना, वो तजुर्बा है
अपना समय अच्छे लोगों की संगत में लगाना, वो तजुर्बा है
ज़िंदगी को कोशिशों से कल से बेहतर बनाना, वो तजुर्बा है
चकाचौंध की जिंदगी से ख़ुद को बचाते चलेजाना, वो तजुर्बा है
किसी की मदद करते समय उसको ना जतलाना, वो तजुर्बा है
ख़ुद को याद दिलाते रहना की पता नहीं हमें कब चले जाना, वो तजुर्बा है
आखिरी घड़ियों में रब का शुक्रिया करना और मुस्कुराना, वो तजुर्बा है

