हरी हिलता क्यों नहीं

ॐ से बनी यह दुनिया, बोम्ब तक पहुंच गई
फिर भी हरी हिलता क्यों नहीं

लोग दर्द में करहा रहे है
बेगुनाह मर रहे है, और तमाशाही तालियां बजा रहे है
खून की नदियां, बह बह कर सुख गई
अब लाल हुई इस इस मिट्टी में, कोई फूल खिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

ताकतवर, कमज़ोर को दबा रहे है
इंसानियत बिक रही है, और हैवान बोलियां लगा रहे है
कहने को तो बहुत कुछ है इस जहान में
पर पेट भर खाना, गरीब के बच्चे को मिलता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं

कहीं सुकून नहीं, चारो तरफ ही शोर है
कोई यहां पाक नहीं, हर दिल में छुपा चोर है
विचारों की ऐसी गुरबत क्यों है यहाँ
की अब गीता ज्ञान से भी, गिरता यह मन संभालता क्यों नहीं

हरी हिलता क्यों नहीं।

क्या है ज़िन्दगी – 2

क्या है ज़िन्दगी?
कुछ भी तो नहीं
बेचारी सांसों की मोहताज़ है

भर्ती है, रोकती है, छोड़ देती है
क्यूंकि अगले सांस की आस है

इसी कशमकश को ज़िन्दगी कहते है
किराए के इस मकान में
ऊपर के चोबरे मैं हम रहते है।