कोई गिला नहीं

ना ही कोई गिला है मुझे, ना ही कोई शिकायत है
बस कट रही है यह ज़िन्दगी, तेरी ही इनायत है

तेरा ही तो दिया सब कुछ है, तुझ पे ही सब कुर्बान है
मां बाप की उधारी यह शरीर है, और तेरी उधारी यह जान है

कुछ अपना नहीं, कुछ पराया नहीं
कुछ मैंने खोया नहीं, और कुछ नया पाया नहीं

मैं हर धड़ी ही पूरा था, मैं हर घड़ी ही पूर्ण हूं
मैं हर घड़ी ही तु था, तु होकर ही सम्पूर्ण हूं।

कुछ पल

आरज़ू कुछ और भी है, कहीं दिल कहीं दिमाग है
अरमान कुछ और भी है, पर निकलने को जान है

आखरी सांसों की उधारी, चल रही है यहां
कुछ पलो के बाद जाने, मैं कहां मैं कहां

अरमानों का दम निकले, उससे पहले सुन लो ज़रा
इक दिन भी जिया नहीं मैंने, बस यूंही व्यतीत किया|