बीता समय, अच्छा था या बुरा, कुछ याद नहीं । क्या वोह लम्हे बरकत के थे या हरज़े के, कुछ याद नहीं ।। याद है तो बस इतना, की जिंदगी थी और हम जिंदा थे । क्यों और कैसे, उतना सब तो अब याद नहीं ।। याद करके करना भी क्या है ओ शायर, समय तो बह कर गुज़र गया । आज खड़ा है सामने हाथ बढ़ाए, की चलो कुछ नई यादें बनाएं ।। अब कोशिश हो की ऐसे जिए, की लम्हा-दर-लम्हा याद रहे । सजाए कुछ ऐसा यादों के आशियाने को, की हमारे जाने के बाद भी वोह आबाद रहे ।।
Category: Poems
मिलते रहो
तुम से बात कर के दिल को एक तसल्ली सी हो जाती है,
की इस पूरी दुनिया में, मेरा भी कोई दोस्त है।
कोई है जिससे जब चाहो तब बात कर लो,
वरना दुनिया में कोई किसी को कहां सुनता है।
आजकल तुमने भी मेरा फोन उठाना बंद कर रखा है,
ख़ुदा करे की किसी परेशानी में ना हो तुम।
तुम ना आयो वोह तो चल जायेगा,
पर तुम्हे कुछ हो जाए, यह हमें ग्वारा नहीं।
ना जाने कौन सा काम करने लगे हो तुम,
जिसमें सांस तक लेने की फुरसत नहीं।
पैसा जरूरी है जिंदगी के चिरागों को रोशन रखने के लिए, पर उसी में लगे रहो, तुम्हे इतनी भी गुरबत नहीं।
मेरा तो चंद सालो का ही खेल बाकी है,
उसके बाद तो रूकसत हो जाना है।
कुछ यादें बटोरना चाहता हूं अपने सफर के लिए,
मुझे मरने के बाद भी मुस्कुराना है।
इसी लिए दरख़्वास्त है मेरी की मेरे दोस्त,
तुम मुझे बार बार आकर मिलते रहो।
मुझे किसी दिन तुम फोन करो,
की तुम मेरे घर के बाहर हो, ऐसा कहो।
मुझे बार बार आकर मिलते रहो।।

