समय

बीता समय, अच्छा था या बुरा, कुछ याद नहीं ।
क्या वोह लम्हे बरकत के थे या हरज़े के, कुछ याद नहीं ।।

याद है तो बस इतना, की जिंदगी थी और हम जिंदा थे ।
क्यों और कैसे, उतना सब तो अब याद नहीं ।।

याद करके करना भी क्या है ओ शायर, समय तो बह कर गुज़र गया ।
आज खड़ा है सामने हाथ बढ़ाए, की चलो कुछ नई यादें बनाएं ।।

अब कोशिश हो की ऐसे जिए, की लम्हा-दर-लम्हा याद रहे ।
सजाए कुछ ऐसा यादों के आशियाने को, की हमारे जाने के बाद भी वोह आबाद रहे ।।

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी तु इतनी हसीन कब थी, जितनी अब है
कुछ भी नहीं बचा मेरे पास, पर लगता है कि सब है

तेरी अदायों का मोल, मैंने अब जाना
मैं कौन था और क्या हूं, खुद को पहचाना

समय अब मुझे डराता नहीं है
चंद घड़ियां ही बची है, यह कह के सताता नहीं है

असल आज़ादी मैंने अब महसूस की है
जो कभी ना उतरे वोह शराब आज पी है

अब इस खुमारी में मुझे जी लेने दो यारों
यहां गम का कतरा भी नहीं है, बस खुशियां है हज़ारों

मैं आज़ाद हूं, और गवाह मेरे रब है
ऐ ज़िन्दगी तु इतनी हसीन कब थी, जितनी अब है।