ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी तु इतनी हसीन कब थी, जितनी अब है
कुछ भी नहीं बचा मेरे पास, पर लगता है कि सब है

तेरी अदायों का मोल, मैंने अब जाना
मैं कौन था और क्या हूं, खुद को पहचाना

समय अब मुझे डराता नहीं है
चंद घड़ियां ही बची है, यह कह के सताता नहीं है

असल आज़ादी मैंने अब महसूस की है
जो कभी ना उतरे वोह शराब आज पी है

अब इस खुमारी में मुझे जी लेने दो यारों
यहां गम का कतरा भी नहीं है, बस खुशियां है हज़ारों

मैं आज़ाद हूं, और गवाह मेरे रब है
ऐ ज़िन्दगी तु इतनी हसीन कब थी, जितनी अब है।

किसी और का दुख

क्यों किसी और कि मौत देखकर
मेरी आंख में आंसू नहीं आते

क्यों किसी का ग़म देखकर
मेरे जज़्बात सहम नहीं जाते

क्यों मुझे मेरा ग़म ही ग़म लगता है

क्यों ज़माने भर की काली रात मुझे दिखती नहीं
जब तक मेरा चिराग़ जागता है

जब औरों के सहारे ही है यह जीवन मेरा
तो फिर क्यों उनका दुख मुझे दिखता नहीं

क्यों मैं अपने सुख मै ही सना रहता हुं
जबकि मालूम है कि कुछ टिकता नहीं

ऐ शायर

कुछ अपनेपन की लकड़ियां इकट्ठी कर
और सद्भावना की आग सुलगा
इसी आग जी रोशनी से
सभी घरों को रोशन कर जा

यही जीवन की सच्चाई है, और कोई जीना जीना नहीं
किसी के ग़म में गर उसे गले ना लगाया
तो वोह सीना सीना नहीं

वोह जीना जीना नहीं।

05.10.2012