मन का ख़ौफ

मन मुझे ख़ौफ दिखता है
आने वाले कल की मुश्किलें बताता है

कहता है कि जब सब जी रहे है इसी तरह
तो क्या सच मुच सही है मेरा दूसरी राह खोजना

कहीं भटक ना जाना, कहीं भटक ना जाना
यह कह कह कर भटकाता है

हूं शुभ चिंतक मैं तुम्हारा
यह कह कर भरमाता है

पर मुझे इस चपल मन की चतुराई का ख़ूब अंदाज़ा है
क्यूंकि इसकी बातों में आकर, खाई ठोकरों के जख्म अभी ताज़ा है

बहुत बार इसकी बातों मैं आ चुका हूं मैं
इसके पीछे चल के ख़ूब ठोकरें खा चुका हूं मैं

अब प्रकाश की इक किरण पकड़ कर
सूरज की तलाश में चलूंगा मैं

खोज अब उसकी ही होगी
चाहे पास जाने पे जलुंगा मैं ।

झटका

इस बार का झटका बहुत भारी पड़ा
झटके पहले भी लगे बहुत,
पर इस बार का झटके ने बहुत कमज़ोर किया

कुछ उम्र का तक़ाज़ा भी था,
और कुछ पहले लगे झटको की सनसनाहट बाकी थी अभी

फिर भी मुस्कुराकर जीने का फैंसला किया था मैंने,
सोचा, की जितना वक्त मिला है चलो उतना ही सही

मेहर उस रब की जिसने इस बार भी बचा लिया,
सब झंझटों परिशानियो को कुछ दिनों मैं ही सुलझा दिया

अब समझ में यह नहीं आ रहा की आगे क्या करामात करू,
जिंदगी के बिखरे टुकड़े समेटु या नए सिरे से शुरुआत करू

आगे क्या करामात करू।।