ना जाने

सोचता हुं कि निकलु मन की कैद से
अरसा हो गया है इस कैद में

कितने सूरज चड़ के उतर गए
पर मेरी आज़ादी कि कोई किरण मेरे दरवाज़े तक ना पहुंची

आसान नहीं है, इन दीवारों को तोड़ पाना
समय और मेहनत दोनों की ही जरूरत है

ना जाने कब मैं की मैं को छोड़ पाऊंगा
ना जाने कब इन दीवारों को तोड़ पाऊंगा।

अजीब बात है

अजीब बात है के तुम नहीं आए
तुम्हारी खुशबु फिर भी महकती है

तुम सामने नहीं हो हमारे
फिर भी नज़र बहकती है

कैसा जादू यह तुमने, नज़रों ही नज़रों में डाला है
लोग कहते है मुझे की मैंने, दर्दे दिल का रोग पाला है।