कुछ यादें

कुछ यादें, कुछ लम्हें
कुछ बातें अनकही

कुछ अपना छोड़ के
कुछ रस्ते मोड़ के

मैं अपने घर से निकाल तोह पड़ा
सोच कर कि सामने सुनहेरा भविष्य है खड़ा

यहां आकर देखी काली रात
पर याद आई घरवालों की समझाई बात

की कुछ भी हो ना घबराना
जो करने गए हो, उसे पूरा कर के ही आना।

दुनिया ने हमें सब सिखाया

दुनिया ने हमें सब सिखाया, पर मरना नहीं
ज़िन्दगी लंबी लगती है मगर, इसका ऐतबार करना नहीं

चंद लम्हों में ही सिमट कर खो जाती है
सांसों की लड़ी देखते ही देखते बंद हो जाती है

मरना तो किसी की ख्वाहिश नहीं है, फिर क्यूं मौत आती है
ज़िन्दगी आंखें नम कर लेती है, पर मौत को ना रोक पाती है

रह रह कर मन मेरा मुझसे पूछता है, की क्या मुझे भी मरना होगा
मैं भी जलूंगा कभी, क्या लकड़ियों का इंतज़ाम करना होगा

मुझे समझ नहीं आता कि अपने मन से क्या कहूं
शायद मैं और मेरा मन हम दोनों ही सच जानते है, पर इसे अनदेखा कैसे करू।