अंगीठी मन बना

मिट्टी बंटी, देश बना
तन बंटे, भेष बना

मन बंटे, कलह कलेश बना
धर्म के ठेकेदारों ने इस सब को जना

गोली का निशाना, हर एक जन बना
जहां फूलों की थी फुलवारी, वोह जगह अब रण बना

खून में लिपटा और लाल हर कण बना
नफ़रत सुलगी और अंगीठी मन बना।

रे ओ श्यामा

रे ओ श्यामा, रेे ओ प्यारे
ना जाने कब मिल होगा
पुकारते है हम चारों पहर
ना जाने कब तेरा दिल होगा

शिकायत मैं नहीं करता
बहाने तुम बनाते हो
कभी किस्मत, कभी बन्धन
कर्मो का बताते हो

अगर तुम ज़िद के पक्के हो
तो कम हम भी है कहां
धरा पर मिल ना पाए गर
तो मिलने आएंगे तू जहां