मेरे इशारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी झूमती, कभी नाचती
साज़ की बजती तारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है हंसती, कभी है रोती
अपने खुद के विचारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी दमकती, कभी चमकती
अपने खड़े किए मीनारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है जलती, कभी है बुझती
व्यंग कसती अंधकारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है चड़ती, कभी उतरती
आ कर रुकती, किनारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी है खिलती, कभी मुरझाती
छा जाती है बहारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी बरसती, कभी गरजती
खुशियां बिखेरे हज़ारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर

कभी सिमटती, कभी बिखरती
बनती तस्वीर दीवारों पर

ज़िन्दगी क्यों नहीं चलती, मेरे इशारों पर।

01.04.05

दिल का हाल

है दिल का यह हाल, कहां से शुरू करूं

टाले टाला ना गया
तुमसे मिलने का मन

जाले में फंस ही गया
तड़पे मेरा यह तन

इक झलक तेरी सूरत की
देखने को मैं तरसा बड़ा

आंखों को रोका था बहुत
पर पानी बरसा बड़ा

कब होगी मुलाकात
कब होगी तू रूबरू

है दिल का यह हाल, कहां से शुरू करूं

चंदा की चांदनी
अब जलाती है मुझे

रात की खामोशी
बिरह गीत सुनाती है मुझे

दिन भी वैसा ही है
जैसी रात है

कैसे जीतेंगे तुझे हम
किस्मत ने ही दी मात है

तुझसे मिलने के लिए
और क्या यत्न करू

है दिल का यह हाल, कहां से शुरू करूं