इस बार का झटका बहुत भारी पड़ा
झटके पहले भी लगे बहुत,
पर इस बार का झटके ने बहुत कमज़ोर किया
कुछ उम्र का तक़ाज़ा भी था,
और कुछ पहले लगे झटको की सनसनाहट बाकी थी अभी
फिर भी मुस्कुराकर जीने का फैंसला किया था मैंने,
सोचा, की जितना वक्त मिला है चलो उतना ही सही
मेहर उस रब की जिसने इस बार भी बचा लिया,
सब झंझटों परिशानियो को कुछ दिनों मैं ही सुलझा दिया
अब समझ में यह नहीं आ रहा की आगे क्या करामात करू,
जिंदगी के बिखरे टुकड़े समेटु या नए सिरे से शुरुआत करू
आगे क्या करामात करू।।
Category: Poems
अपने आप में आयो तुम
चलो दुख मनाना बंद करो, और अपने आप में आयो तुम
यह ज़िन्दगी है दुख मई, समझो संभल जाओ रे तुम
यह ज़िन्दगी कुछ भी नहीं, कुछ लम्हों की खेरात है
अपना पराया क्या यहां, कुछ भी ना जाना साथ है
हर सांस में इक आस है, कितना तुम्हे भटकाएगी
मन की दबी सी आवाज़ है, वोह क्या तुम्हे समझाएगी
सबल करो इस मन को तुम, तृष्णा को पहले त्याग दो
भीतर के उठते वेग को, प्रज्ञा से तुम निकाल दो
बहादो वोह सब कल्पना, जीवन में जिससे भार है
समता में खुद को स्थिर करो, समता ही जीवन सार है।
30/05/2014

