आंखों से पिलाना

प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

आंखों से पिलाना, इस मेखाने की खासियत है
यहां नाच गाना नहीं होता, कुछ ऐसी सुफियत है
यह अल्लाह के बन्दों की मदहोश महफ़िल है

लोग डूब जाते है, वोह आंखें नीची नहीं करते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

कुछ घूंट आंखों के मैं अभी पी के आया हूं
खुद लूट गया हूं मैं, या कुछ लुट लाया हूं
मैं नशे में चूर हूं, मुझसे नहीं पूछो

सरुर ऐसा है कि अब हम फ़िक्र नहीं करते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

यहां शमाए बुझ भी जाए ग़र, परवाने फिर भी जलते है
पीना रोक भी दे ग़र, कहां दिल संभलते है
दिल को आज बेहने दो, जन्नत पे दस्तक दे

जनुन इतना है के कमबख्त, ना मरने से है डरते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

मोहब्बत तीर दे, कमान मैं खुद बना लूंगा
तुम चिंगारी है दो बस, मैं खुद सुलगा लूंगा
कत्ल होने की मेरी ना थी कोई आरज़ू

पर आशिक़ देख ले पल भर, तो ख़ुद-बा-ख़ुद ही है मरते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते

जन्नत की जो थी आरज़ू, हुई महखाने में पूरी
आशिक़ और मुझ में है, प्याले लबों की दूरी
तेरे रूबरू हो कर, मैंने है जो पाया

पाने को उसे फ़रिश्ते, ज़मीन पर है उतरते
प्याले छलक जाते है, जब आंखों से वोह भरते।

आदमी की नस्ल

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

आबरू है बिक रही
बोली लगा रहा है आदमी

गमों नशो में लुट गया
बिखर गया है आदमी

किस शक्ल को देखूं मैं
किस नाज़ से बयां करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

शिकन की बस्ती बस्तियां
लहू हजुम की आंखों में

तल्खियां ही तल्खियां
यहां है सब की बातों में

उम्मीद-ए-चिराग़ बुझ रहे
किस तेल से जवां करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

शौंक दौलत-ए-जहान में
लहू की नदिया बही

कहीं खुद को बचाना था इसे
और ख़ुदा बचाना था कहीं

ख़त्म हो हैवानियत इंसान की
ना जाने क्या दवाँ करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

मंदिर के बाहर रो रहा
पुकारता है आदमी

गर मिले तो खुश है सभी
नहीं तो धितकारता है आदमी

इबादत नहीं यह लूट है
पर मुर्दो से क्या गिला करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू

जलाद बन के काटता
टुकड़ों को बुनता आदमी

क्रोध में जब बह चला
कुछ ना है सुनता आदमी

कैसे मैं समझाऊं इसे
किस लेहज़े में कहा करू

इस आदमी की नस्ल को
किस लफ्ज़ से बयां करू