जब रक्षक ही भक्षक बन जाए

जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तब कौन बचाएं

सदियों से हम किसी ना किसी को मुखिया बनाते रहे
अपनी समझ को इस्तेमाल करने में हिचकिचाते रहे

मुखिया की ही समझ श्रेष्ठ है, इसका क्या प्रमाण है
कभी ना कभी तो वोह भी गलती करेगा, आखिर वोह भी तो इंसान है

मुखिया अपनी ज़िमेदारी भूल चुका है, अब उसकी सरदारी हो गई
और हर मुखिया इससे ग्रस्त हो गया, इतनी भयंकर यह बीमारी हो गई

अब लोगों का पोषण नहीं, बस शोषण होता है
ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे, दीलासो भरा उनका भाषण होता है

समाज को इस महामारी से कैसे मिलेगी निजात
मेरी समझ से तो अब लोगो को ज़िमेदारी लेनी होगी अपने हाथ।

बाकी कुछ नहीं

समय तो ख़ुद-बा-ख़ुद ही निकल जाता है
जब तक जिए फिज़ाओं में

चंद घड़ियां भी बहुत लंबी लगती है
ग़म की छाओ में

दोनों ही वक़्त, झूठे और बेमतलबी है
पर जीवन भर समझ ना सके

कोल्हू के बैल की नाइ
बस चलते ही गए, चलते ही गए

ज़मीर बेचा और प्यार बिक गया
अच्छा वक़्त लाने के लिए

कमबख़्त वक़्त तोह आया नहीं
पर मौत आ गई सुलाने के लिए

अब अपना ही घर नहीं मिल रहा है मुझे
अपने ही गांव में

तन मेरे बहुत जल रहा है
पुराने बरगद की छाओं में

अब अक्ल आए भी तो क्या
तांश के पत्तो का खेल तो पूरा हो गया

अब माफ़ी मांगे भी तो क्या
ज़माने भर के लिए में बुरा हो गया

अब सोच रहा हूं कि कुदरत एक मौका और दे अगर
तो गलतियां सुधार लू

इस बार औरों के लिए जियू
और ज़माने भर को प्यार दू

पर यहां दूसरा मौका देते नहीं
कहते की बेऐतबारी है

अल्लाह को रो कर क्या कहूं
जब गलती ही हमारी है

गर वक़्त है तो जान लो विशाल
सब मिट्टी है और मेला है

पूरे यकीन से इबादत करो उस रब की
गर मजनू है तो लेला है

वोह है, वोह है, वोह है, वोह है
बाकी कुछ नहीं

यह उसकी महफ़िल का नशा है
शराब और साकी कुछ नहीं

इबादत ही सच है, बाकी कुछ नहीं
कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं।