हक़ की बातें करने वालों पर, कैसी आफ़त ढाई है? कलम पकड़ने वाले हाथों पर, लाठी क्यों बरसाई है? पूछ रही हैं दिल्ली की सड़कें, सत्ता के गलियारों से, कब तक बचा के रखोगे, पेपर लीक के जिम्मेदारों को? कितना मारोगे लाचारो को, शोषित और बेचारों को… किताबों के पन्नों पर तुमने, गहरा दर्द बिछाया है, हक़ माँगने जो निकले थे, उन पर ही बल बरसाया है। वोट माँगने जब निकलोगे, बोलो क्या मुँह दिखलाओगे? छल से कब तक दबा सकोगे, जनता के अधिकारों को? कितना मारोगे लाचारो को, शोषित और बेचारों को… दबाओ मत इन आवाज़ों को, वरना ऐसी क्रांति लाएंगी, जहाँ तलक गूँजेगी यह, सत्ता की कुर्सियाँ ढह जाएँगी! इंकलाब की यह आवाज़ें, अब ना झुकने पाएँगी, कब तक रोकोगे तुम बोलो, भविष्य के इन कर्णधारों को? कितना मारोगे लाचारों को, शोषित और बेचारों को…
Category: Poems
जवाब
कुछ तो है जो मुझे सोने नहीं दे रहा
कुछ तो ज़ेहन में चल रहा है आज
क्यू एक डर सा हावी हुआ है मुझपे
क्यू एक उम्मीद कर रहा हूं मैं आज
जब कुछ चाहत ना थी मेरी, तब तो ना डरा था मैं
क्यू एक ज़वाब किसी का, डर की वज़ह बना है आज
क्यू किसी के ज़वाब के इंतज़ार में हूं मैं
क्यूं सोच रहा हूं की क्या ज़वाब मिलेगा आज
कैसे कहूं मन को की सब अच्छा होगा
जो किया वोह अच्छा किया है आज
बड़े दिनों से सोच रहा था, बहुत सोच लगाई थी
तय किया था की जो कहना है, कहेंगे उसे हम आज
हां और ना, कितने मामूली से शब्द है शब्द कोश के
पर मेरे लिए बने है कितने ख़ास वोह आज
थोड़ा वक्त मांगा है उसने मुझसे
मुझे पलो में हो रहा है महीनो का अहसास

