जादू की नगरी

यह दुनिया है उल्फत
जादू की नगरी

यहां नए है नज़ारे
हर एक नई है डगरी

यह काला है जादू
ना इसका कोई तोड़

यह सर चड़ के बोले
ना जाया जाए भी छोड़

यह पागल बना के
नचाए अपने इशारे

यहां आके हमने सीखा
क्या हमारे, क्या तुम्हारे

कहते जग को कविता
पर किस ने रची है

यह किसने रची है

पर जैसी भी है
यहां जी लेते है लोग

जब कुछ मिलकर बिछड़ता
कर लेते है शोक

कुछ अपने है, कुछ पराए भी
जो खिले थे कभी वोह मुरझाए भी

जाना सब को है यहां से
कहते चलती चक्री है

दुनिया जादू की नगरी है

आंदोलन

मंदिर मेहलों से सजे है
लोग लिए खड़े ध्वजे है
फिर भी शांति क्यों नहीं

और लोग बदलने को तैयार है
सड़को पर खड़े मांग रहे अधिकार है
फिर भी क्रांति क्यों नहीं

कुछ इसी तरह के सवाल
पीछले पच्चीस वर्षों से पूछ रहा हूं
नैतिक ज़िम्मेदारी और निजी स्वार्थ
इन दोनों मै ही जूझ रहा हूं

यह वही सवाल है जो की
सदियों से पूछे जा रहे हैं
कोई भी इन से अछूता नहीं है
यह हर किसी के ज़हन में आ रहे है

पर समाज की बुनियाद पर
कैसे पड़े प्रभाव
यह बात जानने लायक है
मिलके खो़जते है हम और आप

ख़ोजा तो पाया कि इंसान का जीवन
पेट की भूख से बंधा है
बदलना और करना तो हर कोई बहुत कुछ चाहता है
पर जरूरते ज़िन्दगी में ही फसां है

थाली की रोटी में ही छूपी
इंसान की क्रांति और शांति है
इसी के लिए मंदिरों में गर्दनें झुकती है
और जनता सरकारों को मानती है

फिर तो जिस दिन थाली में से रोटी जाएगी
उसी दिन इंसान करहाएगा
उस दिन एक नया गांधी पैदा होगा
और मेरे देश में आंदोलन आएगा।