अपनों कि लगाई आग

जो आग मुझे दिख रही है
क्या उसकी तपिश का तुम्हे अहसास नहीं

पूरे घर को जलाकर राख कर देगी यह
तुम्हे इसकी ताक़त का अंदाज़ नहीं

माना कि यह अपनों कि लगाई आग है
पर फिर भी जलाएगी तुम्हे

इस आग की लपटे
आम आग से सो गुना ज्यादा तड़पाएगी तुम्हे

जो आग बुझा सकते थे
उनके मन सोए हुए है

उनसे कुछ उमीद ना करना
वोह ख़ुद बेबस होए हुए है

बचाने के लिए
कुछ भी साधन किसी के पास नहीं

मेरी मानो तो निकलो यहां से
इस धुएं में ले सके ऐसा एक भी सांस नहीं।

तेरे मिलने की उम्मीद

तेरे मिलने की उम्मीद से, दिल में सकून है
सब फीका है अब तो, तुझे मिलने का जुनून है

तेरे दीदार की चाहत का असर कुछ ऐसा है
की ज़िन्दगी ने सांसों कि मोहताजगी छोड़ दी है

हर घड़ी जो तेरी याद रहे, वही दौलत-ए-ज़िन्दगी है
चंद सिक्को के खातिर जो करते थे, वोह चाकरी छोड़ दी है

तुझसे मिलने की आरज़ू में, कटता है अब वक़्त मेरा
ख़ुदा की जो करते थे, वोह बंदगी छोड़ दी है।