मिल जाने को

क्यों है इतना इंतजार रे प्यारे
मेरा जो है, मिल जाने को

घर की दहलीज़ पर खड़े हम है
पर हाथ नहीं दरवाज़ा खटखटाने को

आवाज़ लगा रहा हुं कब से
और कितना वक़्त लगेगा तेरे बाहर आने को

सूनी अनसुनी मत कर प्यारे
मेरे पास कोई और नहीं है दर जाने को

कोई रस नहीं बचा पास है मेरे
एक प्रेम रस है मनाने को

अब तो आ कर मुझे मिल जा ठाकुर
कोई ढंग ना बचा रिझाने को

तू मिले तो सुलझे यह जीवन
पंडित, पोथी तो है उलझाने को

क्यों है इतना इंतजार रे प्यारे
मेरा जो है, मिल जाने को

वक़्त

वक़्त का दस्तुर भी अज़ब निराला है
कभी गिराया और कभी इसी ने संभाला है

यूं तो कायर है, पल पल करके सामने आता है
अतीत की चुभन और भविष्य की फ़िकर, इन दोनों में ही भरमाता है

कभी कमजोर तो कभी बलवान जान पड़ता है
जहां कदर नहीं, वहां तो भरपूर है मगर, कहीं चंद घड़ियां देने में भी अखरता है

मैं इसके रूबरू होना चाहता हूं
मैं इसे बेपर्दा करना चाहता हूं

पर जब भी मुशक्कत करता हूं, कहीं दूर पहुंच जाता हूं
असल को छोड़कर, बेमतलबी गालियों में जरूर पहुंच जाता हूं

पर ज़िद है मेरी, की इक बार तो सामना हो
जिस वक़्त ने चलाया तय ज़िन्दगी, उस वक़्त का कुछ तो जानना हो
इक बार तो सामना हो।

24.02.2015