मुश्किल हालातों ने मजबूरियों को रहने की जगह क्या दी जिंदगी में,
की अब वोह जाने का नाम ही नहीं ले रही है।
हर बार कोई न कोई बहाना बता के,
कुछ देर ओर की मोहलत मांग कर ठहर जाती है।
इस दफ़ा तो कोई बहाना सुनने वाला नहीं हूं मैं,
हाथ पकड़ कर निकाल बाहर करने वाला हूं मैं।
पर मेरी ताक़त-ए-परवाज़ कुछ कम है इन दिनों,
बस इसी मजबूरी के चलते कुछ कह नहीं पाता हूं मैं।
मजबूरियों ने चारो तरफ से ऐसे घेरा है मुझे,
के बेबस और लाचार सा महसूस करता हूं खुद को।
ए मेरे मौला, अब तू ही इमदाद कर मेरी,
मुझे मेरी सब मजबूरियों से निजात दिला दे।
इंसान बना के भेजा था ना तूने मुझे मेरे मौला,
मेरे अंदर बैठा वो इंसान बस जगा दे।
जगा यकीन अपने रहम-ओ-करम का मेरा अंदर मौला,
मेरे अंदाज-ए-नज़र मैं असर बड़ा दे।
मजबूरियों को बदल दे कोशिशों में मेरी,
मुझे मेरी मंजिल-ए-आराम तक पहुंचा दे।।
Category: Poems
दादा जी
जी कहा है सदा उन्होंने, जी ही सदा कहलाया है
जब पूछा की क्या हाल है, ‘रंग लगा’ बतलाया है
जब पूछा की क्या हाल है, ‘रंग लगा’ बतलाया है
यह बनिया बातों का खज़ाना, ना जाने क्या क्या समाया है
बहुत किया होगा तप मैंने, जो ऐसे दादा जी को पाया है
तेहमत कुर्ता टोपी वाले ने, धारी शाह नाम कहलाया है
बचपन से ही उन्होंने, हर काम कर दिखाया है
जामुन का है पेड़ जो इनका, उसे कभी ना हिलाया है
बस ब्याज में जो जामुन मिले, उन्हीं को खुश हो खाया है
बड़ी पैनी है नज़र इनकी, हर एक चीज़ दिखती है
नहीं गए है स्कूल कभी, पर कलम दुरुस्त लिखती है
कान भी बड़े पतले है इनके, हर बात की खबर होती है
मुंह में नहीं है दांत इनके, जैसे सीप से चोरी हुए मोती है
है पक्के असुल बापू के चेले
राम राम जपते जब होते अकेले
खाने में मुंगी की दाल ही भाए
शाम को अपनी महफ़िल में जाए
हर बार दी है सही सलाह, हर बार सही रास्ता दिखाया है
बहुत किया होगा तप मैंने, जो ऐसे दादा जी को पाया है।

